क़तर के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक क्षेत्र में एक बड़ी जीत

 

कहीं ऐसा तो नहीं है कि क़तर ने बहुत पहले ही यह महसूस कर लिया था कि ज़िद्दी तानाशाहों, बादशाहों या राजनेताओं की तुलना में इस्लामी चरमपंथियों से बात करना ज़्यादा आसान और फ़ायदेमंद है. अगर ऐसा है भी तो यह क़तर के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक क्षेत्र में एक बड़ी जीत है.

लगभग तीन लाख आबादी वाले 4471 वर्ग मील के इस छोटे से देश की 'राजनयिक' जीत पर एक नज़र डालते हैं. सूची तो काफी लंबी है, लेकिन यहां कुछ बातों का ज़िक्र ज़रूरी है.

क़तर ने साल 2008 में यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच मध्यस्थता की (यह अलग बात है कि लड़ाई अभी तक चल रही है), 2008 में लेबनान के युद्धरत गुटों के बीच वार्ता में मध्यस्थता की, जिसके बाद साल 2009 में गठबंधन की सरकार बनी.

साल 2009 में ही सूडान और चाड के बीच विद्रोहियों के मुद्दे पर बातचीत में भाग लिया. जिबूती और इरिट्रिया के बीच सीमा पर सशस्त्र संघर्ष के बाद, साल 2010 में क़तर उनके बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए सहमत हो गया. जिसे अफ्रीकी गठबंधन ने भी काफी सराहा.

इतना ही नहीं, बल्कि साल 2011 में सूडान की सरकार और विद्रोही समूह लिबरेशन एंड जस्टिस मूवमेंट के बीच भी दारफ़ूर समझौता कराया, जिसे दोहा समझौता भी कहा जाता है.

साल 2012 में हमास और फ़तह समूहों के बीच भी, शांति और अंतरिम सरकार बनाने के समझौते में क़तर की अहम भूमिका थी और इस समझौते पर भी हस्ताक्षर दोहा में ही किए गए थे. लेकिन जिस मध्यस्थता की आजकल सबसे ज़्यादा बात हो रही है और जिसने एक नया इतिहास बनाया है, वह तालिबान और अमेरिका के बीच अफ़ग़ानिस्तान से वापसी का समझौता है जो अपने आप में एक मिसाल है.

क़तर की राजधानी दोहा में हुए इस समझौते के तहत, अमेरिका को एक निर्धारित तारीख़ तक अफ़ग़ानिस्तान से निकलना था. हालांकि इसमें इस बात का ज़िक्र नहीं था कि अमेरिका के जाने के बाद काबुल पर कौन शासन करेगा, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी से लेकर, तालिबान नेता हबीबुल्लाह अख़ुंदज़ादा तक सभी जानते थे कि काबुल की गद्दी पर कौन बैठेगा.

अगर किसी चीज़ को लेकर कोई संदेह था, तो वह इस प्रक्रिया की गति थी कि ये हस्तांतरण कितनी तेज़ी से होगा.

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