Udaipur Congress Chintan Shivir चिंतन के साथ चिंता करने की भी जरूरत

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कांग्रेस पार्टी आज से फिर तीन दिन तक चिंतन करेगी। कांग्रेस पहले भी कई बार चिंतन कर चुकी है इसलिए उसमें कोई खास बात नहीं है। असली बात यह है कि कांग्रेस और उसका शीर्ष नेतृत्व चिंता कर रहा है या नहीं। राहुल गांधी के अभी तक के एडीट्यूट को देख कर ऐसा लग रहा है कि उनको रत्ती भर चिंता नहीं है कि पार्टी हार रही है। उनमें रत्ती भर चिंता नहीं दिखती है कि नेता पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं या पार्टी का संगठन कमजोर हो रहा है या कई राज्यों में पार्टी के अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं हो रही है या जहां अध्यक्ष नियुक्त कर दिए गए वहां संगठन नहीं बन पा रहा है। कांग्रेस जब लगातार सत्ता में रहती थी या सत्ता में आती-जाती थी तब तक तो यह एटीट्यूड चल रहा था लेकिन अब जबकि ऐसा लग रहा है कि पार्टी स्थायी तौर पर सत्ता से बाहर हो गई है तब भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का यहीं नजरिया है।

तभी कांग्रेस के कई नेता मान रहे हैं कि चिंतन करने से कुछ नहीं होगा, जब तक पार्टी चिंता नहीं करेगी। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य मानते हैं कि चुनावी हार-जीत से उनकी स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए वे क्यों चिंता करें। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को चिंता नहीं है इसी वजह से दूसरे नेताओं को चिंता करनी पड़ रही है और वे अपनी चिंता में पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। और जहां तक अपनी स्थिति पर फर्क नहीं पड़ने की सोच है तो उस पर भी सोनिया व राहुल गांधी को फिर से सोचना चाहिए। उनकी स्थिति पर भी बहुत फर्क पड़ सकता है। आखिर उनकी एसपीजी की सुरक्षा वापस हो गई है और प्रियंका गांधी वाड्रा का बंगला भी खाली हो गया। यह शुरुआत है। आने वाले दिनों में ऐसी कई चीजें हो सकती हैं। अगर कांग्रेस का चुनाव जीतना नहीं शुरू हुआ तो अकबर रोड का पार्टी कार्यालय खाली होगा, कई बंगले वापस लिए जाएंगे, पार्टी टूटेगी और पार्टी के नाम व चुनाव चिन्ह पर भी संकट खड़ा होगा। इसलिए चिंतन के साथ साथ पार्टी चिंता भी करे।