इंद्र की पूजा क्यों नहीं की जाती है? जानिए

 

ऋग वेद के सबसे शक्तिशाली देवता है इंद्र और खूब पूजा होती थी इनकी. सत्युग में इनकी पूजा खूब थी त्रेता युग में भी थी. द्वापर युग के अंत में ज़ब भगवान ने श्री कृष्ण अवतार का लिया तब इंद्र की पूजा बंद करवाई और गोवर्धन पर्वत कनिष्ठा ऊँगली पर उठाकर इंद्र की चुनौती स्वीकार कर, ब्रज वासियों की रक्षा उस घनघोर वारिस से कर, इंद्र देव का घमंड झंड किया.

फिर गोवर्धन महाराज की पूजा शुरू हियी और इंद्र की पूजा बंद हियी. इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण से माफ़ी मांगी और क्षमा याचना की.गोवर्धन महताज की पूजिनिय प्रतिमा. इसमें गोबर से श्रीकृष्ण का चित्र बनाया जाता है और उसकों शाम में दूध घी और मक्खन खिर से पूजा जाता है. भगवान का ग्वाला रूप है.


गोवर्धन महाराज ब्रज वासियों को गायों और अन्य पशुओं के लिए चारा, घुमने के लिए जंगल, स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ वायु, लम्बा चौड़ा मैदान देते थे. पुरे ब्रज क्षेत्र की आजीविका और अर्थव्यवस्था गोवर्धन महरज पर भी काफ़ी हद तक आश्रित थी. अतः इंद्र कि जगह गोवर्धन महाराज की पूजा होने लगी और इसे कृष्ण भगवान ने शिरू करवाया, यह पूजा अब भी निरंतर चल रही है. दीपावली के दूसरे दिन पड़वा के दिन गोवर्धन महाराजा की उपासना विधि विधान से हर घर में होती है.

गोवर्धन का शाब्दिक अर्थ भी गोधन की बृद्धि है अर्थात गाय बैल बछड़ा आदि की संख्या में बढ़वार. आज भी किसान की आजीविका में गोधन का बडा योगदान है. फिर भी अब खेती मशीन से होने के कारण महत्व कम हो गया है. अतः गोवर्धन सिर्फ एक पर्वत पहाड़ या चोटी हि नहि है परन्तु ब्रज की संस्कृति का अटूट हिस्सा है. गोवर्धन कि परिक्रमा भी इनकी पवित्रता और पौराणिक महत्व के कारण भक्त जन अब भी कर रहे है. हर माह कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी से पूर्णिमा तक परिक्रमा होती है.

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