भगवान शिव की तीसरी आंख का क्या राज है?

 

हम अपने दोनों आंख से 3 आयाम स्थापित कर पाते हैं, अगर हमारे पास तीसरी आंख हो तो हम चौथी आयाम यानी समय को भी देख सकेंगे।

एक मात्र भगवान शंकर ही ऐसे हैं जिनकी तीन आंखें हैं, उस आंख से वे वह सबकुछ देख सकते हैं जो आम आंखों से नहीं देखा जा सकता।

तीसरी आँख एक वैज्ञानिक तथ्‍य है। हो सकता है अभी इसका पूरा राज विज्ञान की पकड़ में न आया हो, लेकिन इससे उसके यथार्थ में कोई फर्क नहीं पड़ता।

[सत्‍य वैज्ञानिक खोजों पर निर्भर नहीं है।]

आज हम इलेक्ट्रानिक उपकरणों द्वारा इन अनुभवों की व्‍याख्‍यायित कर सकते है। पहले कुंडलिनी के लिए सांप का प्रतीक था, अब उसे विद्युत शक्‍ति की उपमा दी जाती है। जो कि अधिक यथार्थ है। शरीर के भीतर विद्युत तो दौड़ सकती है। सांप नहीं।

वैज्ञानिक अनुसंधान का अर्थ है: कल्‍पना की उड़ानें न भरकर यथार्थ के धरातल पर उत्‍तर आयें। हमारे भीतर पैठे हुए असत्‍य का साक्षात करें, सत्‍य अपने आप प्रगट हो जायेगा।केंद्र को ‘’तीसरी आँख’’ कहते है। तीसरा कान या तीसरी नाक नहीं कहते। यह बहुत सारगर्भित है। दो भौंहों के बीच विराजमान यह केंद्र देखने की अपूर्व क्षमता रखता है। यह देखना विशुद्ध पारदर्शी, सुने मन का देखना है। यह शक्‍ति का जागरण नहीं है। शांति की स्फुरणा है।

वैज्ञानिक रहस्य : मस्तिष्क के दो भागों के बीच एक पीनियल ग्लेंड होती है। तीसरी आंख इसी को दर्शाती है। इसका काम है एक हार्मोन्स को छोड़ना जिसे मेलाटोनिन हार्मोन कहते हैं, जो सोने और जागने के घटना चक्र का संचालन करता है। जर्मन वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि इस तीसरे नेत्र के द्वारा दिशा ज्ञान भी होता है। इसमें पाया जाने वाला हार्मोन्स मेलाटोनिन मनुष्य की मानसिक उदासी से सम्बन्धित है। अनेकानेक मनोविकारों एवं मानसिक गुणों का सम्बन्ध यहां स्रवित हार्मोन्स स्रावों से है।

यह ग्रंथि लाइट सेंसटिव है इसलिए कफी हद तक इसे तीसरी आंख भी कहा जाता है। आप भले ही अंधे हो जाएं लेकिन आपको लाइट का चमकना जरूर दिखाई देगा जो इसी पीनियल ग्लेंड के कारण है। यदि आप लाइट का चमकना देख सकते हैं तो फिर आप सब कुछ देखने की क्षमता रखते हैं।

यही वो पीनियल ग्लेंड है जो ब्रह्मांड में झांकने का माध्यम है। इसके जाग्रत हो जाने पर ही कहते हैं कि व्यक्ति के ज्ञान चक्षु खुल गए। उसे निर्वाण प्राप्त हो गया या वह अब प्रकृति के बंधन से मुक्ति होकर सबकुछ करने के लिए स्वतंत्र है। इसके जाग्रत होने को ही कहते हैं कि अब व्यक्ति के पास दिव्य नेत्र है। यह पीनियल ग्लेंड लगभग आंख की तरह होती है। पीनियल ग्लेंड जीवधारियों में पूर्व में आंख के ही आकार का था।

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