ये है दुनिया का सबसे रहस्यमयी मंदिर, साक्षात दर्शन देते हैं भगवान..!

 
भारत का एक ऐसा मंदिर, जिसके गर्भगृह में स्थापित भगवान को आप साक्षात देख सकते हैं, उनसे हाथ जोड़कर मन्नत मांग सकते हैं। भारत के इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर को यूनेस्को ने विश्व-धरोहर के रूप में संजोया है।यह दुनिया का सबसे अनूठा मंदिर है।
 


इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि इसे दुनिया के सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक माना गया है यह विश्व-धरोहर है। यह मंदिर इतना खूबसूरत है कि इसका बाह्य आवरण और नक्काशी किसी भी पुरातात्विक वास्‍तुशिल्‍पी के विद्वान और शिल्पकला व नक्कावशी के कलाकार को दांतो तले अंगुलियां दबाने के लिए मजबूर कर देंगी। यह मंदिर भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा के पुरी जिले में 21 मील उत्तरर पूर्व की ओर चंद्रभागा नदी के किनारे कोणार्क में स्थित है। इसे कोणार्क का मंदिर या कोणार्क का सूर्य मंदिर कहा जाता है।
 


लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट पत्थर से 1236– 1264 ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गए इस मंदिर की पूरी दुनिया में चर्चा होती है। दरअसल, यह भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन 1984 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। इस मंदिर की कल्पना बेहद सुंदर तरीके से की गई है, जो इसके वास्तु शिल्प की रचना की भव्‍यता में साफ दिखाई देता है। दरअसल, इस मंदिर की कल्पना सूर्य के रथ के रूप में की गई है। रथ में बारह जोड़े विशाल पहिए लगे हैं और इसे सात शक्तिशाली घोड़े तेजी से खींच रहे हैं।
 


 मंदिर अपनी विशालता, निर्माणसौष्ठव तथा वास्तु और मूर्तिकला के समन्वय के लिए अद्वितीय है और उड़ीसा की वास्तु और मूर्तिकलाओं की चरम सीमा प्रदर्शित करता है। एक शब्द में यह भारतीय स्थापत्य की महत्तम विभूतियों में है। यह भारत का एकमात्र भव्य सूर्य मंदिर है। चूंकि सूर्य स्वयं साक्षात देव हैं, जिनके बिना इस सृष्टि का संचालन नहीं हो सकता, लिहाजा इस मंदिर में स्थापित भगवान के हम साक्षात दर्शन करते हैं।
 


इस मंदिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं, बाल्यावस्था-उदित सूर्य- जिसकी ऊंचाई 8 फीट है, युवावस्था जिसे मध्याह्न सूर्य कहा जाता है, इसकी ऊंचाई 9.5 फीट है, जबकि तीसरी अवस्था है प्रौढ़ावस्था, जिसे अस्त सूर्य भी कहा जाता है, जिसकी ऊंचाई 3.5 फीट है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मंदिर की कहानी सीधे भगवान श्री कृष्णी से जुड़ती है। दरअसल, यह मंदिर सूर्यदेव (अर्क) को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय लोग बिरंचि-नारायण कहते थे। यह जिस क्षेत्र में स्थित था, उसे अर्क-क्षेत्र या पद्म-क्षेत्र कहा जाता था।

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