धन के साथ आदर भी कमाते हैं ऐसे लोग!

 
आज भी लाखों रुपए से भरा बैग जब कोई टैक्सीवाले भोंसले या रिक्शे वाले दुबे उसके मालिक को ढूंढकर लौटा देते हैं तो मुम्बई की मानवीयता वैश्विक पटल पर चर्चित होती है। आम लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन चुकी आटोरिक्शा, टैक्सी और बस में यात्रा के दौरान कई अनुभव मिलते हैं। ऐसे ही एक सज्जन रिक्शा वाले मिले रामरतन शुक्ल, उम्र लगभग 60 साल, चेहरे पर तेज झलक रहा था और कपड़ों से गरीबी झांक रही थी। माथे पर चंदन और रिक्शे के अंदर ‘राम’ लिखा था। किसी की साधुता और सज्जनता के विश्लेषण के लिए इतना काफी था।

‘कहां चलेंगे साहब।’ उनकी वाणी में नम्रता थी। ‘स्टेशन!’ बोलकर मैं रिक्शे में बैठ गया। रास्ते में सिग्नल आया। 2-3 बच्चे सिग्नल पर ही भीख मांग रहे थे। रिक्शेवाले शुक्ल जी ने बिस्कुट के कुछ पैकेट निकाले। बच्चों को पुकारा तथा पैकेट उनमें बांट दिए। मैं मन ही मन उनकी उदारता का कायल हो रहा था। मेरा गंतव्य आ गया। मैं उतरा, 36 रुपए किराए के लिए मैंने उन्हें 50 रुपए दिए।

उन्होंने कहा, ‘‘छुट्टा नहीं है साहब, सिर्फ 10 रुपए हैं।’’

मैंने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, आप 4 रुपए रख लीजिए।’’

उन्होंने कुछ कहा नहीं बल्कि एक डायरी निकाली और उसमें कुछ लिखने लगे। डायरी के बारे में पूछने पर बोले ‘आपकी’ तरह जो कोई पैसा छोड़ देता है उतने पैसे लिख कर उतने ही पैसों से बाद में मैं बिस्कुट या कुछ खाने-पीने का सामान खरीदता हूं और गरीबों में बांट देता हूं। इस तरह मिले पैसों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।’’

‘मेरा-मेरा’ के इस दौर में ‘मेरा नहीं है’ सुनना अच्छा लगा। रिक्शे का मीटर बदल कर वे फिर निकल पड़े। मैं भगवान से मना रहा था, काश! ऐसे शुक्ल हर जगह हों तो गरीबों का भी थोड़ा पेट भरे। रिक्शा आगे बढ़ चुका था। रिक्शा के पीछे लिखा था ‘मुस्कान’।

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