लॉकडाउन के चलते खेतों में मजदूरी करने को मजबूर साहित्य अकादमी विजेता लेक्चरर

 
कोरोना वायरस के प्रसार के साथ ही लगभग हर हफ्ते किसी न किसी क्षेत्र से हजारों कर्मचारियों को बिना वेतन के छुट्टी देने, नौकरियों से निकालने, वेतन में भारी कटौती की खबरें आ रही हैं।इस वायरस ने लोगों की जिंदगियों को ही बदल दिया है। लोगों नई जॉब खोजने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे है।लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लग रहा है। आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे है जो कुछ महीने पहले बंगले में रहता ता और आज खेती करने पर मजबूर है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हम बात कर रहे है महाराष्ट्र के सांगली जिले के रहने वाले नवनाथ गोरे की जो अहमदाबाद के एक कॉलेज में लेक्चर के पद पर तैनात थे।लेकिन कोरोना वायरस के कारण उनकी नौकरी चली गई और वो अब खेती में काम करने पर मजबूर हो गए है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 2018 में 32 साल के गोरे को साहित्य अकादमी युवा लेखक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।लेकिन यह पुरस्कार भी ऐसे समय में किसी व्यक्ति को कैसे संत्वाना दे सकता है जो महामारी की वजह से बुरी स्थिति में फंस गया हो। नौकरी जाने के बाद उनके घर के आर्थिक हालत खराब हो गए और परिवार की रोजी रोटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनको गृह जिले में खेतिहर मजदूर का काम शुरू किया।अगर बात करे इनकी डिग्रियों की तो इनके पास कोल्हापुर जिले के शिवाजी विश्वविद्यालय से मराठी में परास्नातक की डिग्री है. उन्होंने परास्नातक की पढ़ाई के दौरान ही अपना पहला उपन्यास ‘फेसाटी’ लिखना शुरू किया था. यह किताब 2017 में प्रकाशित हुई और उन्हें अगले साल साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया।गोरे काम की तलाश में क्षेत्र में काफी दूर निकल जाते हैं और वह बताते हैं कि अगर वह पूरा दिन काम करते हैं तो उन्हें 400 रुपये की राशि मिलती है।

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