कोर्ट पर बोझ है शराबबंदी कानून बेल कैंसिल करने से भी इनकार बिहार सरकार को झटका

 
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को झटका देते हुए मद्य निषेध कानून में दी गई जमानत के खिलाफ दायर अनेक याचिकाओं को बुधवार को खारिज कर दिया। जमानत याचिकाओं के खिलाफ सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि बिहार के इस कानून ने अदालतों पर बहुत बोझ डाला है। आए दिन मद्य निषेध कानून, 2016 के तहत याचिकाएं दायर होती हैं। इस कानून के तहत 10 साल की सजा का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश कहा, ''पटना हाईकोर्ट में रोज अनेक ऐसी याचिकाएं आती हैं और वहां इन्हें सूचीबद्ध होने में एक साल तक का समय लग रहा है। हमें बताया गया है कि पटना हाईकोर्ट में 10–15 जज रोजाना ऐसी याचिकाएं सुन रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने इससे पहले एक कार्यक्रम में भी बिहार के इस कानून का जिक्र किया था। कहा था कि सरकारें कानून के प्रभाव का अध्ययन किए बिना कानून बनाती हैं, जिससे अदालतों पर बोझ बढ़ जाता है। बिहार सरकार के वकील मनीष कुमार ने कहा कि हाईकोर्ट यांत्रिक रूप से ऐसे मामलों में जमानतें दे रहा है, जिससे कानून का लक्ष्य ही पराजित हो रहा है, इन्हें रद्द किया जाना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि तो क्या ये जमानतें न दी जाएं। क्योंकि आपने आबकारी कानून बना दिया है जिसमें शराब पकड़े जाने पर 10 साल या उम्रकैद की सजा है। कोर्ट ने पूछा कि हत्या की क्या सजा है। वकील ने कहा कि उम्रकैद या मौत की सजा। कोर्ट ने पूछा तो उसमें जमानतें नहीं मिलती हैं? यह कहकर कोर्ट ने जमानत रद्द करने की याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया।

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