Maharashtra Politics MLA Defection दलबदल से मतदाता की रॉय को धोखा दिया जाता है…

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भोपालं। महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार को गिराने के लिए की जिस प्रकार की कवायद हुई उसने पूरे राष्ट्र की उस भावना को ध्वस्त कर दिया कि जनता का विश्वास छला गया हैं। क्यूंकि द्वारा जिन लोगों ने पाला बदल किया वह उनकी कुर्सी की लालच को दिखाता हैं। फिर विधानसभा के स्पीकर की नोटिस को जिस प्रकार वर्तमान सरकार के स्पीकर द्वारा निरस्त किया गया, वह विधानसभा में बहुमत के फेरबदल का ही नतीजा हैं। परंतु एक सवाल यह भी हैं कि जिन लोगों के मत से दलबदल करने वाले लोगों ने सरकार गठित की क्या उन्होंने उन मतदाताओं के विश्वास को धोखा नहीं दिया हैं !

पाकिस्तान की पंजाब अससेंबली में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के 20 सदस्यों ने पाला बादल कर हमजा शरीफ की मुस्लिम लीग से हाथ मिला कर उनकी सरकार बनवा दी। परंतु वहां के सुप्रीम कोर्ट ने उन 20 विधायकों को अयोग्य करार दिया। फलस्वरूप वहां उपचुनाव करने पड़े ! परंतु हमारे देश में दल बदल पर अदालतें मौन रहती हैं ! क्यूं ? क्या दलबदल मतदाता की पसंद को धोखा नहीं हैं ? आखिर जन प्रतिनिधित्व कानून जिसके तहत विधानसभा और लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होते हैं उनका अर्थ यह नहीं होता क्या कि जिस प्रतिनिधि को वे चुन रहे हैं, वह एक राजनीतिक दल का उम्मीदवार हैं वह अकेला लाखों मतदाताओं के वोट और समर्थन को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकता अगर उसे अपनी निष्ठा बदलनी हैं तब उसे दुबारा अपने मतदाताओं में अपनी हैसियत परखना चाहिए। यह कानूनी और नैतिक रूप से उचित हैं। तब किस आधार पर दल बदल को अदालतें अनदेखा करती हैं।

निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय : महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार को अपदस्थ करने के लिए जिस प्रकार संसदीय मर्यादा का उल्लंघन किया गया और जिस प्रकार करोड़ों रुपये खर्च करके विधायकों को गोवा और गौहाटी के पाँच सितारा होटल में ठहराया गया और जिस प्रकार उनको लाने और जाने के लिए हवाई जहाज का उपयोग किया गया वह सर्व विदित हैं। परंतु ना तो भारतीय जनता पार्टी ने और ना ही मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसका खुलासा किया कि दलबदल के विधायकों की खातिरदारी तथा उनके आने – जाने का खर्च किसने भुगतान किया ! ईडी जो करोड़ों के घोटालो की जांच करती हैं जो चिदम्बरम और गांधी परिवार को शक के कारण ही पूछताछ करती हैं, उसे यह कांड शायद दिखाई नहीं पड़ता ! क्यूंकि इसके लिए केंद्र संरकार के हाकिमों ने जांच की इजाजत नहीं दी। वैसे बीजेपी खुद को इस मामले से अपने को अलग रखने का रूपक रच रही हैं। परंतु आम जनों में सभी को वस्तुस्थिति पता हैं। फिर क्यंू नहीं कोई कारवाई होती ?

वैसे दलबदल के लिए जिस प्रकार पैसे और प्रभाव का इस्तेमाल महाराष्ट्र में हुआ वह लोकशाही के लिए चिंताजनक हैं। क्यूंकि यह खुलेआम वोटर की मर्जी का उल्लंघन हैं। क्यूं नहीं पार्टी से अलग होने वाले विधायक और सांसद को पुनः अपने मतदाताओं का मन जानने का प्रविधान होता हैं।

हालांकि मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए जब ज्योतिरदितय सिंधिया के नेत्रत्व में काँग्रेस से बगावत हुई थी – तब जिन कांग्रेसी विधायकों ने पार्टी छोड़ी थी, उन्होंने बीजेपी के बैनर तले उप चुनाव लड़ा था। एवं एक महिला विधायक इमारती देवी को छोड़कर शेष को उनके मतदाताओं ने पुनः अपना विश्वास व्यक्त किया था। जिससे की मौजूदा नेत्रत्व शिवराज सिंह सरकार पर मर्यादाहीनता का आरोप नहीं लगाया जा सका। क्यूंकि उन्होंने इन विधायकों को जनता से निर्वाचित होने के बाद सदन में स्थान दिया।
क्या बीजेपी के शीर्ष नेताओं को महाराष्ट्र में में यह भरोसा नहीं हैं कि वे शिवसेना के बागी विधायकों को पुनः मतदाताओं का विश्वास प्राप्त करने में सफल होंगे ?

शायद इसी बात को लेकर शंकित शिंदे और बीजेपी दोनों ही शिवसेना के संगठन पर कानूनी कब्जा करना चाहते हैं। वैसे अभी यह लड़ाई चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के पाले में हैं। चुनाव आयोग ने जहां शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट को संगठन पर दावों को 8 अगस्त तक प्रस्तुत करने का निर्देश दिया हैं। अब संगठन का अर्थ अगर संसदीय और विधायक दल हैं तब शिंदे गुट का वर्चस्व साफ हैं। परंतु यदि संगठन का अर्थ तालुका और जिला स्टार पर सदस्य और पार्टी पदाधिकारी हैं तब ठाकरे परिवार का दबदबा अभी वहां हैं। केवल ठाणे की शिवसेना इकाई ही अभी तक शिंदे के समर्थन में खुलकर आई हैं, शेष तालुका और जिला इकाइयों ने ठाकरे को ही समर्थन दिया हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट भी इस विवाद को साधारण विवाद नहीं मान रही हैं। इसीलिए उसने इस मुद्दे को संविधान पीठ में भेजने की कवायद शुरू की हैं। अब यह पीआरआरटीएच पाँच जजों की होगी अथवा उससे अधिक की यह भविष्य के गर्भ में हैं। परंतु इतना तो साफ हैं कि सर्वोच्च न्यायालय भी इस पूरे प्रकरण में धन के और पद के प्रलोभन देखना चाहता हैं और उस पर अपनी खरी -खरी रॉय रखना चाहता हैं। इसीलिए उसने महाराष्ट्र विधान सभा के स्पीकर को निर्देश दिया हैं कि वे अभी ठाकरे गुट के विधायकों की अयोग्यता के बारे में कोई निर्णय नहीं ले। अब सरकार भले ही बीजेपी और शिंदे की हो पर तलवार तो उनके सर पर लटक ही रही हैं।

जनप्रतिनिधियों द्वारा मतदाता की मर्जी जाने बगैर मनमानी करने का उदाहरण पड़ोसी राज्य श्रीलंका में दिखाई पड़ा हैं। जहां राष्ट्रपति गोटाबाया को जनता के आक्रोश के आगे देश छोड़ कर भागना पड़ा। कितनी दयनीय स्थिति हैं कि राष्ट्रपति को अपना राष्ट्र ही छोड़ कर भागना पड़ा। अब उन्हें मालदीव और सिंगापुर की सरकारों ने राजनीतिक शरण देने से इंकार कर दिया हैं। इसका स्पष्ट अर्थ हैं कि आप तभी तक राजसिंहासन पर हैं जब तक जनता चुप है या चाहती हैं। परंतु एक बार आपके कारनामो से जनता परिचित हो गयी तब तब आपको भागने के सिवाय कोई चारा नहीं हैं। यह सबक सभी नेताओ के लिए हैं।