Leaders crisis in Jharkhand BJP झारखंड भाजपा में नेता का संकट

झारखंड में ऑपरेशन लोटस के सफल होने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा नेता की है। कांग्रेस या विपक्षी पार्टियों की सरकार गिराने का अभियान जहां भी सफल हुआ वहां पार्टी की कमान किसी मजबूत नेता के हाथ में थी। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने कमाल किया तो मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने। महाराष्ट्र में भले देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री नहीं बन पाए लेकिन राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक के चुनाव में विपक्षी विधायकों से क्रॉस वोटिंग कराने और निर्दलीय विधायकों को सरकार से अलग करने का काम उन्होंने किया। झारखंड में भाजपा के पास न तो येदियुरप्पा हैं और न शिवराज व फड़नवीस।

पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के प्रति पार्टी आलाकमान का सद्भाव है लेकिन वे विधायक नहीं हैं। अर्जुन मुंडा भी तीन बार मुख्यमंत्री रहे हैं और केंद्र में मंत्री हैं लेकिन वे भी विधायक नहीं हैं। आदिवासी मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष समीर उरांव भी सांसद हैं और पिछड़ी जाति की राजनीति में पार्टी का चेहरा बन कर उभर रहीं अन्नपूर्णा देवी भी सांसद व केंद्रीय मंत्री हैं। झारखंड के हालात को देखते हुए पार्टी आलाकमान किसी गैर विधायक को मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम नहीं लेना चाहता।

हाल ही में अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करके घर वापसी करने वाले बाबूलाल मरांडी विधायक दल के नेता हैं और इस नाते मजबूत दावेदार हैं। पर उनके रास्ते में दो बाधाएं हैं। पहली बाधा तो यह है कि उनकी विधायकी पर तलवार लटकी है। उनकी पार्टी के तीन में से दो विधायक कांग्रेस में गए थे और उन्होंने मरांडी को पार्टी से निकालने का ऐलान किया था। इस आधार पर स्पीकर के पास उनकी अयोग्यता का मामला लंबित है। दूसरे, कांग्रेस से बगावत की तैयारी कर रहे कुछ विधायक उनका नेतृत्व मानने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में पार्टी के पास दूसरा आदिवासी चेहरा नीलकंठ मुंडा का है, जो लगातार पांचवीं बार विधानससभा का चुनाव जीते हैं। वे रघुवर दास की सरकार का आदिवासी चेहरा थे और सरकार में नंबर दो की हैसियत के मंत्री थे। वे ईसाई आदिवासी बहुल इलाके से जीतते हैं इसलिए इस इलाके से जीते कांग्रेस के विधायकों को भरोसा दिलाने में सक्षम हैं।