Tuesday, June 28, 2022
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draupadi murmu presidential candidate चिंता आदिवासी की ब्रांडिंग नमो-

भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश ही नहीं बल्कि दुनिया में एक ब्रांड बन चुके हैं…. तो चार बार के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज भाजपा के निर्विवाद स्वीकार्य नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं.. वह बात और है कि विरोधी और विपक्ष नमो -शिवाय की इस जोड़ी पर उनकी नीति और नीयत पर सवाल खड़े करते रहे हैं….मगर सच यही है कि मोदी ग्लोबल लीडर के तौर पर उभरे जिन्होंने ने देश की राजनीति की दिशा बदली… तो शिवराज का मामा फेक्टर मध्य प्रदेश की सियासत में यदि भाजपा की ताकत तो कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहा है.. देश के साथ मध्य प्रदेश में ओबीसी यदि राजनीति की धुरी बना हुआ तो दलित के साथ आदिवासी को लुभाने की होड़ से इनकार नहीं किया जा सकता..

प्रदेश भाजपा दफ्तर में आदिवासी वेशभूषा में जब शिव – विष्णु झूम कर नाचे

मध्य प्रदेश के जंबूरी मैदान से जनजाति वर्ग का गौरव दिवस से लेकर राष्ट्रपति की महिला आदिवासी उम्मीदवार द्रोपति मुर्मू के नाम के ऐलान के साथ यह साफ हो जाता है कि भाजपा के लिए जनजाति वर्ग उसका नेतृत्व उस वर्ग के मतदाता आखिर कितना अहम हो जाते है.. मध्य प्रदेश के बीजेपी कार्यालय में द्रोपति मुर्मू के नाम के ऐलान के साथ जब नामांकन भी नहीं भरा गया तब जश्न प्रदेश भाजपा दफ्तर में मनाया गया और उसमें शामिल शिवराज और विष्णु दत्त की जोड़ी यह बताने के लिए काफी है कि आदिवासी वोट बैंक पर उसकी पैनी नजर है.. जिसे वह भाजपा से हर हाल में जोड़े रखना चाहती है.. मध्यप्रदेश में सिंधिया फैक्टर से अस्तित्व में आई शिवराज सरकार लगातार आदिवासी पर फोकस बनाए हुए हैं.. वह बात और है कि राज्यसभा की 2 सीटों के लिए एक पिछड़े और एक दलित वर्ग की महिला को संसद में भेजा गया ..

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं राष्ट्रपति उम्मीदवार के नामांकन दाखिल करने के दौरान दिल्ली में मौजूद रहेंगे.. दरअसल चुनाव जीतने के लिए ब्राह्मण,बनिया की पार्टी कहलाने वाली बीजेपी ने अपनी कार्यशैली भी बदली है.. अब दलित,आदिवासी की फिक्र के जरिए उन्हें अपने वोट बैंक में तब्दील करने की कोशिश तेज हो गई है…. मकसद वोट बैंक में अतिरिक्त इजाफा करना और कांग्रेस समर्थक मतदाताओं को रिझाना भी है… यह कहना गलत नहीं होगा पीछे छूट गया वो दौर…जब कही जाती होगी बीजेपी शहरी इलाके की पार्टी कही जाती होगी…अगड़ों यानि ब्राह्मण बनियों की पार्टी…जोड़ा जाता होगा…. हिंदुत्व कमंडल की सियासत की यदि दिशा बदल दी …

जातीय समीकरण दुरुस्त करना उसकी प्राथमिकता बन चुका है चाहे फिर वह मोदी मंत्रिमंडल विस्तार ही क्यों ना हो जब जाति वर्ग समुदाय का प्रतिनिधित्व चर्चा का विषय बना था.. मोदी शाह के युग में बहुत कुछ बदल गया तो पुरानी कार्यशैली सबकुछ पीछे छूट गया…चुनाव जीतने वाली सियासत में बीजेपी की कार्यशैली ऐसे बदली…कि अब लगता ही नहीं बीजेपी….वही बीजेपी है जो कभी कमंडल की सियासत की वकालत करती थी…और उसकी काट के लिए वीपी सिंह को मंडल कमीशन की बात करनी पड़ी….2014 में मोदी के आने के बाद न केवल बीजेपी में आमूलचूल बदलाव आया….बल्कि राजनीति की दशा और दिशा भी बदली है…नरेंद्र मोदी बीजेपी ही नहीं देश का एक बड़ा ब्रांड बन चुके हैं… लगातार लोकसभा के 2 चुनाव जीतने के साथ कई राज्यों में बीजेपी की सरकार यह संदेश दे चुकी है कि बीजेपी का विस्तार तेजी से हो रहा है .. नरेंद्र मोदी ग्लोबल लीडर के तौर पर उभरे हैं…

वो बात और है विरोधी उनकी नीति और नीयत पर सवाल खड़े करते हैं…मगर ये सच है कि मोदी अब सियासत का ब्रांड हैं.. मोदी का हर दांव आज के दौर की सियासत में हिट है…कमंडल की बात करने वाली बीजेपी ने खुद को ऐसा बदला कि अब मंडल की सियासत को भी खुद में समाहित कर लिया…. हिंदुत्व के समर्थकों को जोड़ें रखते हुए और दूसरे हर वर्ग को जोड़ने की कोशिश जारी है.. यही वजह है कि 2017 में राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का नाम का ऐलान करके बीजेपी ने सबको चौंकाया था….और देश को पहला दलित राष्ट्रपति मिला….तो अबकी बार एक आदिवासी महिला द्रोपदी मुर्मू को सामने लाकर विरोधियों को सोचने को मजबूर कर दिया…देश की सियासत में अब जातिगत समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है बीजेपी…याद कीजिए जब मोदी मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर अगड़ों,पिछड़ों और एससी,एसटी वर्ग से ताल्लुक रखने वाले मंत्रियों की संख्या गिनाई गई….अब जब ओबीसी वर्ग को लेकर गर्म है….

तो आदिवासी महिला चेहरे को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना बड़ी सियासी दूरगामी सोच को बताता है…कहा जा रहा है कि द्रोपदी मुर्मू के नाम के जरिए बीजेपी ने आदिवासी वोटबैंक को अपने पाले में करने की कोशिश की है…क्योंकि उसकी नजर 2024 लोकसभा चुनाव के साथ….4 राज्यों के विधानसभा चुनाव पर है…एमपी,छत्तीसगढ़,राजस्थान और झारखंड में 2024 के पहले विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजनी है…और इन राज्यों में आदिवासी वर्ग इतना मजबूत….कि किसी की भी सत्ता बदलवाने की हैसियत रखता है…तो देश की 55-60 लोक सभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर आदिवासी वोटर्स का सीधा असर है….चार राज्यों में एसटी वर्ग के लिए 128 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं….और बीजेपी के खाते में महज 35 सीटें हैं….जबकि कांग्रेस के पास 86 सीटें…लिहाजा अब आदिवासी वोटबैंक को लुभाने की कोशिश है…. मध्यप्रदेश में आदिवासी वर्ग की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा है….

और 84 सीटों पर असर…2018 के चुनाव में 82 आरक्षित सीटों में बीजेपी के खाते में महज 34 सीटें ही आईं थी…बीजेपी से न केवल आदिवासी वोटबैंक छिटका था….बल्कि एससी वोट बैंक ने भी मुंह मोड़ लिया था….लिहाजा अब एमपी में कोशिश आदिवासी वोटबैंक को लुभाने की है…जंबूरी मैदान में पीएम मोदी जनजाति वर्ग के सम्मेलन में शरीक हो चुके हैं….तो गृह मंत्री अमित शाह दो बार आदिवासी वर्ग से रूबरू हो चुके हैं…और मध्यप्रदेश सरकार की तारीफ कर चुके हैं… विष्णु दत्त की भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक भी आदिवासी थीम में तब्दील हो गई थी ..तो आदिवासी वर्ग की फिक्र और सम्मान से जुड़ी तस्वीर भोपाल में भी नजर आई….

बीजेपी दफ्तर में आदिवासी वर्ग की द्रोपदी मुर्मू को प्रत्याशी बनाए जाने का जश्न मनाया गया… वह भी जब नामांकन दाखिल नहीं किया गया अलबत्ता एनडीए उम्मीदवार द्रोपति मुर्मू कि दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात जरूर हो रही थी.. प्रदेश भाजपा दफ्तर के मंच पर शिवराज सिंह चौहान के पीछे बीजेपी के पदाधिकारी और कार्यकर्ता खड़े थे….मगर अचानक से शिवराज सिंह चौहान ने सबको मंच से नीचे उतरने को कहा…और मंच पर आदिवासी कलाकारों को जगह दी….और ये संदेश भी कि सम्मान के असली हकदार…आदिवासी ही हैं…और संदेश देने की कोशिश है कि आदिवासियों की असल हितैषी बीजेपी ही है…. भाजपा ने आदिवासी पर फोकस बनाकर मंचासीन नेताओं के लिए क्राइटेरिया तय कर दिया था लेकिन प्रदेश पदाधिकारी फोटो सेशन के लिए मंच पर जा पहुंचे थे ..

भगवान राम और राम मंदिर की बात करने वाली बीजेपी के लिए राम आराध्य हैं….तो शबरी माता भी पूज्य… बिरसा मुंडा को भगवान का दर्जा भाजपा पहले ही दे चुकी है ..यानि वोटबैंक की खातिर ही सहीमगर चिंता आदिवासी की है…. पिछड़ा वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत रखते हुए बीजेपी आदिवासी मतदाता के अंदर बड़ी घुसपैठ की संभावनाएं तलाश रही है.. चेहरा आदिवासी का ब्रांडिंग नमो -शिवाय की….. भाजपा के प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल ने तो एक कदम आगे आकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया कि असली ब्रांडिंग आदिवासी की ही हो रही है ,.. रजनीश का मानना है आदिवासी का उत्थान और उसे मुख्यधारा में लाने में जुटी बीजेपी को इसका सियासी फायदा भी मिलेगा.. सवाल जब आदिवासी नेत्री द्रौपदी मुर्मू का चेहरा सामने लाया गया है तो क्या कांग्रेस दलगत राजनीति से उठकर द्रोपती के समर्थन में सामने आएगी..

खासतौर से कांग्रेस से जुड़े आदिवासी विधायक और सांसद क्या साहस जुटा पाएंगे… फिर भी सवाल खड़ा होना लाजमी.. सवाल क्या देश के नए राष्ट्रपति के लिए सत्ता पक्ष ने द्रोपती मुर्रु एक आदिवासी चेहरा सामने लाने से क्या सोशल इंजीनियरिंग मजबूत होगी..राष्ट्रपति चुनाव के जरिए क्या भाजपा सियासी हित साध रही, या फिर योग्यता और आदिवासी का सम्मान माना जाए..भाजपा ने अल्पसंख्यक अब्दुल कलाम, दलित रामनाथ कोविंद और अब आदिवासी द्रोपती मुर्रु इसे सबका साथ सबका विकास माना जाए.. भाजपा में जश्न तो क्या यह नमो. शिवाय की ब्रांडिंग या फिर सता रही आदिवासी वोटों की चिंता..राष्ट्रपति का पद जाति, धर्म, वर्ग समुदाय से ऊपर तो फिर सियासत क्यों और कितनी जरूरी.. आदिवासी राष्ट्रपति के जरिए क्या मध्य प्रदेश और देश में भाजपा का वोट बैंक मजबूत होगा..राष्ट्रपति देश का.. दलगत राजनीति से उपर.. फिर भी सहमति बनाने के प्रयास जब सफल नहीं होते..

तो मुकाबला वोटिंग के साथ देखने को मिलता रहा.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में जो माहौल बनाया जा रहा इसे भाजपा का एक और प्रयोग या फिर उसकी दूरगामी रणनीति का हिस्सा माना जाए.. जो वह एक तीर से कई निशाने साध रही है.. ऐसे में राष्ट्रपति के लिए पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू का आदिवासी समाज से प्रतिनिधित्व ने न सिर्फ विपक्षी दलों को सोचने को मजबूर कर दिया ..बल्कि भाजपा और एनडीए के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित होने जा रहा.. फिर भी राष्ट्रपति चुनाव के जरिए चर्चा में सिर्फ आदिवासी नहीं ..बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री शिवराज भी सुर्खियों में हैं.. जिसकी अपनी वजह सवाल नमो शिवाय की ब्रांडिंग से क्या 2023 से लेकर 2024 तक भाजपा को फायदा होगा

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