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congress party political crisis ‘मरे हुओं को मारने’ की नीति तक उचित….?

भोपाल। भारत का सबसे वयोवृद्ध राजनीतिक दल कांग्रेस इन दिनों अपनी मृत्यु शैय्या पर अंतिम साँझ की प्रतीक्षा कर रहा है, ऐसी परिस्थिति में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा सत्ता का सहारा लेकर उसकी श्वांस नलिका ऑक्सीजन सिलेंडर से हटाने का प्रयास करना कहां तक उचित कहा जा सकता है। ऐसा माना जाता रहा है न कि ‘‘जन्म देने वाला ही जीवन छीनता है’’ वहीं स्थिति कांग्रेस के साथ है, सोनिया-राहुल परिवार के पूर्वज पं. मोतीलाल नेहरू कांग्रेस को पालने-पौसने वाले माने जाते रहे है, अब प्रकृति के सिद्धांत के अनुसार उस कांग्रेस का अंत करने का अधिकार भी तो उसी खानदान को है? congress party political crisis

और अब वही कुछ इस देश में हो रहा है, सोनिया-राहुल के बाद इस देश में न सिर्फ नेहरू खानदान खत्म हो जाएगा बल्कि इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी की भी ‘इतिश्री’ हो जाएगी, आज तो ऐसा ही माना जा रहा है, फिर यहां अब का अहम् सवाल यही है कि स्वयं डूबने वाले इंसान के पैरों में पत्थर बांधने का क्या अर्थ है? और आज का सत्तारूढ़ दल व उससे बड़े नेता सोनिया नेता सोनिया-राहुल को विभिन्न कानूनी शिकंजों में फंसा कर वही कर रहे है।

आज यह तथ्य देश की किसी भी जागरूक नागरिक से छुपा हुआ नहीं है कि मोदी नाम के सूरज की चमक में देश के सभी छोटे-बड़े राजनीतिक दल अपनी चमक खोकर अंधकार में खो गए है, इनमें राष्ट्रीय दल कांग्रेस भी शामिल है, जो अपना मूल अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रख पा रही है, इस स्थिति में जब कांग्रेस स्वयं ही खात्मे के कगार पर है तो फिर उसे कानूनी धक्का देने की क्या जरूरत है? वह तो वैसे ही डूब रही है?

सरकार का यह कदम देश के आम नागरिक के दिल में कांग्रेस व उसके मौजूदा प्रमुखों के प्रति दया की भावना पैदा कर रहा है, यदि इस दया को ‘सहायता’ का हाथ मिल गया तो फिर इसके लिए दोषी तो सतारूढ़ दल व उसके सर्वेसर्वा ही होगें ना?

भाजपा का अभी भी यह मानना है कि देश में अब कांग्रेस के अलावा कोई भी राजनीतिक दल उससे मुकाबले के काबिल नहीं रहा है, उसे अभी भी यह आशंका है कि कांग्रेस के नेतृत्व में ममता बैनर्जी संयुक्त प्रतिपक्षी दल का गठन कर सकती है, कांग्रेस को समर्थन करना ममता की मजबूरी यह है कि उनका दल तृणमूल कांग्रेस क्षेत्रिय दल है राष्ट्रीय दल नहीं और फिलहाल देश में भाजपा के बाद चूंकि कांग्रेस ही एकमात्र राष्ट्रीय दल है, इसलिए इसका सहयोग लेना या इसका समर्थन करना हर क्षेत्रिय दल की मजबूरी है, और वास्तव में भाजपा की चिंता का भी यही एक मुख्य कारण है, इसी लिए भाजपा ‘‘मरे हुओं को मारने’’ का कृत्य करने को मजबूर है।

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काँग्रेस का यह भी दुर्भाग्य है कि उसमें सोनिया-राहुल के अलावा कोई भी प्रमुख नेता पूरी निष्ठा के साथ उसके साथ नहीं है, अब तो गुलाम नबीं आजाद ने भी स्वास्थ्य के आधार पर कांग्रेस से कन्नी काटना शुरू कर दिया है, यही स्थिति प्रदेशों की है, प्रदेशों के शीर्ष नेता जो कभी ‘‘राष्ट्रीय नेता’’ का चोला, ओढ़कर घूमते थे, उनका भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई असर नहीं रहा, इनमें मध्य प्रदेश के कमलनाथ व दिग्विजय सिंह भी शामिल है, इसी कारण कभी केन्द्र सहित देश के अधिकांश राज्यों में राज करने वाली कांग्रेस अब आधा दर्जन से भी कम राज्यों तक सिमट कर रह गई है, और भारतीय जनता पार्टी देश के दक्षिणी राज्यों में अपनी पैठ कायम करने के प्रयास में है।

वैसे यदि आज भी पूरे देश में राजनीतिक दलों की पंसदगी को लेकर सर्वेक्षण कराया जाए तो देश के पचास की उम्र पर लोगों की पसंद का सर्वाधिक प्रतिशत कांग्रेस के ही पक्ष में होगा, जबकि चालीस की उम्र के नीचे के चुवा भाजपा या किसी अन्य दल के समर्थक नजर आएगें, ऐसी स्थिति मेंयदि ‘मृतप्राय कांग्रेस’ का इलाज किसी सही डॉक्टरों के समूह में पहुंच जाए तो कांग्रेस नया जीवन प्राप्त भी कर सकती है, इसी उम्मीद में आज देश का आम कांग्रेस समर्थक जी रहा है, किंतु अब इस वर्ग की भी मौजूदा परिस्थितियों में निराशा बढ़ती जा रही है, क्योंकि कहीं से भी कांग्रेस को नया जीवन प्रदान करने के आसार नजर नहीं आ रहे है।

किंतु यहां यह मानना भी जरूरी है कि चूंकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही मजबूत प्रतिपक्ष्ज्ञ के समर्थक है, जैसा कि उन्होंने एक बार ऐसा कहा भी है, इसलिए उन्हें ही स्वस्थ राजनीति के तहत प्रमुख प्रतिपक्षी दल की जीवन रक्षा के प्रयास करना चाहिए, और कांग्रेस के खात्में के बाद ‘‘नादिर शाही’’ के भावी आरोप से बचने का प्रयास करना चाहिए और फिर इसके बाद मोदी जी को ‘‘स्वस्थ व सिद्धांतवादी’’ राजनीति के मुखिया होने का गौरव जो हासिल हो जाएगा? congress party political crisis

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