HomeNationalagneepath scheme protest modi भारतीय सेना में जीवनदानी सैनिक होते है

agneepath scheme protest modi भारतीय सेना में जीवनदानी सैनिक होते है

भोपाल। भारतीय सेना:इतिहास बताता है कि वर्तमान देश यानि काश्मीर से कन्याकुमारी और आसाम से गुजरात तक का स्वरूप 1857 के संग्राम के बाद अंग्रेज़ों की शासन व्यवस्था के फलस्वरूप बना है। अक्षय कुमार जैसे इतिहासकार इसका विरोध कर सकते हैं। उन्हे हक़ हैं भारत में। हमारा इतिहास बताता है कि 1857 में भी देश रियासतों में विभजित था, सबकी अपनी सेना हुआ करती थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जिन रियासतों को जीता था उनमें बस सांकेतिक रूप से ही राजाओ को सेना रखने की छूट दी थी।

लेकिन उन्होंने उनके इलाके के लोगों को कंपनी सरकार की फौज में भर्ती किया। हाँ उनके अफसर गोरे ही होते थे। विक्टोरिया के शासन के बाद कमोबेश इसी आधार पर सेना का गठन हुआ। राजपूत, जाट, सिख, महार, गडवाली, कुमायु, मद्रास, बिहार, बंगाल आदि कुछ नाम है जो भारतीय पैदल सेना में हैं। इनमें सिर्फ एक रियासत का नाम आज भी उसके रिसाले से जुड़ा है जोधपुर का ऊँटो का रिसाला, जो दुनिया में अपनी तरह का पहला दस्ता हैं। यद्यपि अब तो सीमा सुरक्षा बल में भी इन ऊँटों का एक दस्ता होता है।

इन तथ्यों को रखने का तात्पर्य यह हैं कि मौजूदा सेना का गठन अंग्रेज़ों द्वारा किया गया था। जो पाकिस्तान श्रीलंका और तबके वर्मा आज के म्यांमार तक में है। ब्रिटेन में सेना एक सम्मान हैं। वहां राजगद्दी के भावी उतराधिकारी भी सेना में भर्ती होकर सेवा करते हैं। वहां चार साल के लिए भर्ती नहीं होती। हाँ अमेरिकी सेना में भी उन लोगों को भी भर्ती किया जाता हैं जो किसी विषय या कोर्स में अध्ययन करना चाहते हैं, उन्हें सेना के खर्च पर यह सुविधा दी जाती हैं। निश्चित अवधि तक सेना में सेवा देने के बाद वे अध्ययन का लाभ उठा सकते हैं। परंतु वहां भी इन अल्पकालीन सैनिकों का भविष्य अधिकतर सुखद नहीं होता। कारपोरेट जगत में सेवा के दौरान ये अवैध धंधों में पद जाते हैं। ब्रिटेन में सेना की भर्ती यानि एक कैरियर होता हैं। इजरायल का उदाहरण भारत के संदर्भ उचित नहीं हैं ना ही माकूल हैं।

अग्निवीर योजना के फायदे गिनाने वाले अनेक लेख और बयान टीवी और अखबार तथा व्हाट्स एप्प युनिवेर्सिटी में भरे पड़े हैं। योजना की तारीफ में चार साल की अवधि की ट्रेनिंग अथवा सेवा के बाद 23.50 लाख हाथ में होंगे ! फिर चाहे आप कोई बीजनेस करो या कोई कोर्स करे सरकार मदद करेगी ! यानि तेईस लाख रुपये सामान्य सैनिक चार साल में नहीं जोड़ पाते है ? सेना में अभी भी कमीशनड़ अफसर बाहरी कोरस करने के लिए भेजे जाते हैं। हाँ यह सुविधा जवानों और जूनियर कमिशन अफसरों को नहीं हैं। कभी कभार विदेश में पोस्टिंग के लिए इन लोगों को भी महिना पंद्रह दिन की ट्रेनिंग कराई जाती हैं।

अग्निवीर योजना क्यू : रक्षा मंत्रालय के अफसर और उनकी सलाह पर समझने और चलने वाले नेता के अनुसार भारत की सेना का बजट का अधिकांश हिस्सा वेतन – भत्ते की मद में निकाल जाता हैं। पेंशन की भी मद में काफी धन खर्च होता हैं। अब आप समझे इस योजना का कारण इन अफसरों और नेताओं को सामरिक हथियार चलाने वाले तकनीकी लोग चाहिए ! जान पर खेलने वाले रन बांकुरे सैनिक नहीं। यह भी कहा गया योजना के द्वारा सेना को तकनीकी कौशल युक्त जवान और अफसर मिल सकेंगे। सवाल यह हैं कि क्या सिग्नल कोर जो सम्पूर्ण सेना में संवाद बनाए रखने की जिम्मेदार हैं उसमें भी अफसरों से ज्यादा सूबेदार, मेजर साहब और जवान होते हैं। आज के युग में में कंप्यूटर, मोबाइल गांव गांव पहुँच गए हैं। शिक्षा का प्रसार भले ही उत्तर भारत में कम हो पर जामताड़ा जैसे इलाके साइबर दुनिया के बदनाम इलाके हैं। पर यह इस बात के भी गवाह है कि उचित शिक्षा के बाद ये देश निर्माण में काम आ सकते हैं।

जिन अफसरों और नेताओं ने वित्तीय बोझ का अतर्क देकर भारतीय सेना को सिकोड़ने का सुझाव दिया है वे भूल जाते हैं कि राज्य के लिए जितना एक सरकार का होना जरूरी हैं उससे ज्यादा मजबूत सेना का होना जरूरी हैं। क्यूंकि सरकार और राज्य का अस्तित्व सेना की सुरक्षा में ही संभव हैं। जनहा छोटी सेनाए हैं,जैसे प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों में वहां आए दिन तख़्ता पलट होता हैं। बगल में म्यांमार और पाकिस्तान उदहरण हैं रि जब सेना का सार्वदेशिक रूप नहीं होता हैं और सांस्कृतिक एकता की भावना नहीं होती तब ऐसी फौज अपने ही देश के नागरिकों की भूखी हो जाती हैं।

हमारे भारत वर्ष में ऐसी स्थिति विगत 70 वर्षो में कभी नहीं आई। इसका एक कारण सेना में विभिन्न क्षेत्रों और जातियों का समूह मौजूद हैं। जिनको जोड़ने वाली शक्ति हमारा संविधान हैं। सोचिए आपरेशन ब्ल्यू स्टार के समय कितनी सिख पलटनों के जवानों ने फौज को छोड़ दिया था। वह तो सेना ने इन बागियों को फौजी कानून के तहत दंडित नहीं किया। क्यूंकि उन्हें माफी देकर छोड़ दिया गया। आज भी सिख पलटन हमारी सेना में हैं। क्यूंकि वर्षो की ट्रेनिंग और सेना की आंतरिक अनुशासन ने उन लोगों को अपनी गलती को समझने का अवसर दिया।

क्या साढ़े तीन साल के इन सैनिकों जिन्हे अग्निवीर कहा जा रहा वह भावना पनपेगी ? शायद नहीं। क्यूंकि एक तो इन्हें अपनी पलटन के संस्कार और अभिमान और गौरव का भान भी नहीं हो पाएगा ! फिर हथियार चलाने में ट्रेंड अग्निवीर अगर आगे के जीवन में सफल नहीं हुए तो क्या वे पंजाब और मुंबई के गैंग के सदस्य नहीं बनेंगे?

संघ के एक पुराने नेता हुए हैं डॉ मुंजे, जो दूसरी बड़ी लड़ाई के समय इटली गए थे ,जब वहां फासिस्ट नेता बेनिटो मुसोलिनी का राज था। मुसोलिनी ने ब्लैक शर्ट का एक संगठन बनाया था। जो काफी हिंसक और उग्र था, वह विरोधियों और उनकी बात नहीं मानने वालों को मारता पीटता था। इन काली कमीज वालों का इटली में आतंक जैसे था। वे कुछ फौज से निकाले और उनके द्वरा ट्रैंड लोगों को इसमे भर्ती किया जाता था।

जिनहे हथियार चलाने सिखाया जाता था। जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में लाठी लेकर चलने और गाहे बगाहे हथियार का प्रदर्शन भी करते हैं। आज जब की देश का माहौल अत्यंत नफ़रत तथा हिंसा से भरा हैं ऐसे में असफल अग्निवीरों के लिए ऐसा संगठन स्व्ााभविक शरणगाह हो सकता हैं। ऐसा नहीं की सभी परंतु इस बात की संभावना को टाला नहीं जा सकता। जो देश के शनि पूर्ण माहौल को भीषण बना देगा। अभी अमेरिका में हथियारों पर पाबंदी लगाने की बात उठ रही हैं क्यूंकि वहां सामूहिक हत्यकाण्डों की संख्या बढ़ रही हैं। वैसे भी भारत वर्ष में गैर कानूनी असलाहों की मौजूदगी तो सबको मालूम ही हैं।

सेना का जवान आज अवकाश प्राप्त करने के बाद समाज विरोधियो से भिड़ने और लड़ने की सोच और ताकत रखता हैं। क्यूंकि वह सेना से सम्मान पूर्वक अच्छी ख़ासी पेंशन के साथ गांव में रहता हैं। परंतु बिना पेंशन और ग्रेचुटी का अग्निवीर कितने दिनों अपनी रोटी खा सकेगा।

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