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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मुख्य केंद्र था मुरादाबाद, लोगों में आजादी की जंग का जोश भरने तीन बार आए थे महात्मा गांधी

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मुरादाबाद,अमृत विचार। देश की आजादी में मुरादाबाद का महत्वपूर्ण योगदान है। यहां के लोगों में गुलामी की बेड़ियों से जकड़ी भारत माता को आजाद कराने की तड़प थी। यह माटी गोरों की धुर विरोधी थी, इसलिए जंगे आजादी की असरदार बिगुल यहां फूंका गया। आसपास के लड़ाकों ने समय-समय पर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। मुरादाबाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मुख्य केंद्र था, इसलिए लड़ाई के पहले तीन बार यहां मोहनदास करमचंद गांधी आए।

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असहयोग आंदोलन के दौरान 1920 में यहां लड़कों का बड़ा अधिवेशन हुआ। डॉ. भगवान दास ने उस सभा की अध्यक्षता की थी। सम्मेलन शहर के महाराजा थियेटर में हुआ था, जिसमें असहयोग आंदोलन की भूमिका तैयार हुई। महात्मा गांधी, पं. मदन मोहन मालवीय, पं. मोती लाल नेहरू, पं. जवाहर लाल नेहरू सम्मेलन में मुख्य रूप से शामिल हुए थे। अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं उत्तराधिकारी संगठन के महामंत्री धवल दीक्षित सेनानियों के संघर्ष की कहानियों के संग्रह से इस बात की पुष्टि करते हैं।

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बताते हैं कि दूसरी बार 12 अक्टूबर 1929 को महात्मा गांधी यहां आए थे। तब रघुवीर सरन खत्री, पं. शंकरदत्त शर्मा, प्रो. रामसरन, पं. बाबूराम शर्मा, मा.अशफाक हुसैन, जगन्नाथ सिंघल, बूलचंद दीक्षित, बनवारी लाल रहबर के नेतृत्व में शहर के लोगों ने उनका स्वागत किया था। वह रघुवीर सरन खत्री की बग्गी में बैठकर ब्रजरतन पुस्तकालय तक आए थे। लोगों ने जगह-जगह फूल की वर्षा करके उनका स्वागत किया था। पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि भीड़ इतनी अधिक थी कि बग्गी से उतरकर सामने पुस्तकालय तक पहुंचने में 15-20 मिनट लग गए। उद्घाटन के बाद वहीं सीढ़ियों पर खडे़ होकर लोगों को संबोधित किया था। मास्टर राम कुमार ने तिलक कर स्वागत किया था और एक लिफाफा भी भेंट किया। तीसरी बार महात्मा गांधी कोलकाता जाने के दौरान यहां रेलवे स्टेशन पर कुछ समय रुके थे। लोगों के आग्रह पर स्टेशन पर ही सभा को संबोधित किया था।

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