सिद्धू ने भी समझा होता

कभी रेडियो पर चलने वाले विज्ञापनों में एक विज्ञापन ‘मोदी धागों’ का भी आता था। कहा जाता था ‘मोदी धागे, सबसे आगे। तब लोग समझ लेते थे कि मोदी धागे ही मज़बूत हैं। पर कपिल शर्मा शो में तालियाँ पिटवाने वाले नवजोत सिंह सिद्ध भाजपा में शामिल होने के बाद भी यह भूल गए कि मोदी सबसे आगे। और इसी नासमझी का नतीजा वे शायद आज पंजाब की जेल में महसूस कर रहे होंगे। भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए तो पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले आप पार्टी ने भी उन्हें पार्टी में शामिल होने के लिए दाना डाला पर दाना चुंगने की बजाए सिद्धू कांग्रेस में ही बैठे रहे। अब जब वे काम को नहीं देंगे तो ख़ाली बैठे अपने ही नेताओं को निपटाने में लग गए। पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को और पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को। चलो कैप्टन निपटे तो बाद में चन्नी भी निपट गए और आख़िर में खुद सिद्धू भी। यानी चले छब्बे बनने और हो गए दुब्बे।

भला यह कैसी राजनीति थी अपने सिद्धू की। समझ ही नहीं पा रहे कि लोग जैसे अपने पाप धोने के लिए गंगा में डुबकी तक लगा देते हैं वैसे ही राजनीति राजनीति चमकाने या फिर पाप धोने के लिए मोदी की भाजपा में शामिल हो लेते हैं । और यही सोचकर कि चलो ग़ैर भाजपा दलों में जो राजनीति गंदी हो ली बदलते दौर की भाजपा में शामिल हो ठीक हो लगी । दुःख- दर्द ठीक होंगे, बदन दर्द भी ठीक रहेगा, मान सम्मान भी मिलेगा और राजनीति में चैन की बंशी बज सकेगी, पर सिद्धू बेचारे लगता है भोले हैं सो चुपचाप कांग्रेस में पड़े रहे और खेल खेलते रहे पर सुप्रीम अदालत के एक झटके ने जता दिया कि सच क्या होता है।

अब एक साल जेल में रहते वे चिंतन करेंगे। पर इस चिंतन से शिविर में आने तक सिद्धू क्या हासिल कर पाएँगे या फिर उन्हें राजनीति के कौनसे धागे मज़बूत महसूस होंगे यह अलग बात है फिलाहल तो जेल में रहते हुए भी राजनीति की तरह ही चर्चा में बने हुए हैं। और चर्चा भी ऐसी कि जेल अधिकारी ही यह नहीं पा रहे कि जेल तो सिद्धू को हुई है और सजा वे भुगतें, पर आख़िर क्यों ? भला कोई पूछे कि सिद्धू के साथ सजा जेल प्रशासन को भी तो सीधी बात कि अगर सिद्धू दिनभर क्या-क्या खाएँगे और क्या पीऐंगे तो इसका इंतज़ाम करना भी कोई कम सजा तो है। यानी सारे क़ैदी एक तरफ़ और सिद्धू भय्या एक तरफ़ होगें तो दिक़्क़त तो होगी ही ना !