वन्य जीव संरक्षण संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश



नयी दिल्ली : सरकार ने लोकसभा में वन्य जीव संरक्षण (संशोधन) विधेयक पेश किया जिसमें पशु पक्षियों एवं वनस्पतियों के संरक्षण को विनियमित करके संरक्षित प्रजातियों को बढ़ाने, और वन्य जीवों तथा वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियो के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संबंध में एक संधि को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया है।
लोकसभा में वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने यह विधेयक पेश करते हुए कहा कि इस विधेयक में वन्य प्राणियों, पक्षियों और पौधों के संरक्षण को विनियमित करने संरक्षित प्रजातियों को बढ़ाने, और वन्य जीवों तथा वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंध में अंतरराष्ट्रीय संधि (साइट्स) को लागू करने का प्रावधान किया गया है। यह संधि सुनिश्चित करती है कि वन्य प्राणियों और पौधों के नमूनों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से उन प्रजातियों के अस्तित्व पर कोई खतरा नहीं होगा। इस संधि के तहत सभी देशों से यह अपेक्षित है कि वे परमिट के जरिए सभी सूचीबद्ध नमूनों के व्यापार को विनियमित करेंगे। इसके अलावा संधि जीवित पशुओं के नमूनों के कब्जे को भी विनियमित करने का काम करेंगे।
श्री यादव ने कहा कि देश की सरकार गरीबों के कल्याण के लिए समर्पित सरकार है। इसलिए इस विधेयक में वनक्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदाय का राष्ट्रीय उद्यान बनाने से पहले पूर्ण विस्थापन होने तक उनके संपूर्ण अधिकारों को सुरक्षित रखा जाएगा जिसमें उनके पशुओं मवेशियों के लिए चारागाह का अधिकार भी शामिल है। वन संपदा के प्रबंधन के लिए समिति में स्थानीय समुदायों की भूमिका सुनिश्चित की जाएगी। पशुओं के मानव के साथ संघर्ष को ध्यान में रखते हुए पकड़े गये पशुओं को वन संरक्षक को सौंपने के प्रावधान के साथ ही हमारी संस्कृति एवं रीति रिवाजों में हाथी के महत्व को ध्यान में रखते हुए हाथियों के परिवहन को लेकर भी उचित प्रावधान किये गये हैं।
चर्चा की शुरूआत करते हुए कांग्रेस के प्रद्युत बारदोलोई ने इस विधेयक को संसदीय स्थायी समिति के परामर्श के पश्चात सदन में पेश किये जाने का स्वागत किया। उन्होंने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि जीव जन्तुओं एवं वनस्पतियों की 38 हजार 800 से अधिक प्रजातियों को संरक्षित करने की आवश्यकता है और वनस्पतियों की प्रजातियों की तस्करी को रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधानों की कमी है। उन्होंने असम के अगर का उदाहरण पेश करते हुए कहा कि अगर का उत्पादन वनक्षेत्र में ना के बराबर रह गया है और इसकी संरक्षित खेती और तस्करी हो रही है।
भारतीय जनता पार्टी के कीर्तिवर्धन ंिसह ने विधेयक का समर्थन करते हुए इस समय की मांग बताया। उन्होंने विधेयक के महत्वपूर्ण बिन्दुओं की चर्चा करते हुए कहा कि इस विधेयक से वनसंपदा के बेहतर प्रबंधन किया जा सकेगा। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के ए. राजा ने कहा कि इस विधेयक में दो प्रकार के प्राधिकार की बात कही गयी है -एक प्रबंधकीय प्राधिकार एवं एक परामर्श प्रकृति का वैज्ञानिक प्राधिकार। उन्होंने कहा कि विधेयक में अंतरराष्ट्रीय संधि का हवाला देकर वनसंपदा का दायित्व केन्द्र सरकार के अधीन कर दिया गया है। जबकि वन संपदा राज्यों का विषय होता है तो विधेयक में नयी व्यवस्थाओं में राज्यों की भूमिका क्या होगी, यह नहीं बताया गया है।
तृणमूल कांग्रेस की अपरूपा पोद्दार ने भी विधेयक में वनसंपदा के संरक्षण एवं विनियमन में राज्य सरकारों की भूमिका को लेकर सवाल उठाये। उन्होंने संसदीय स्थायी समिति के सुझावों को विधेयक को शामिल करने का अनुरोध किया। उन्होंने हाथी के संरक्षण एवं परिवहन के लिए प्रावधानों को आवश्यक बताया। वाईएसआर कांग्रेस के के. गोरन्टला माधव ने भी विधेयक का समर्थन किया।
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में संशोधन करने वाले इस विधेयक में साइट्स संधि के इन प्रावधानों को लागू करने का प्रयास किया गया है। अधिनियम में वर्तमान में विशेष रूप से संरक्षित पौधों (एक), विशेष रूप से संरक्षित पशुओं (चार) और वर्मिन्स (एक) की छह अनुसूचियां हैं। वर्मिन ऐसे छोटे जानवर होते हैं जो बीमारियां लाते हैं और भोजन को बर्बाद करते हैं। बिल निम्नलिखित के जरिए इन अनुसूचियों की संख्या को घटाकर चार करता है: (1) विशेष रूप से संरक्षित पशुओं की अनुसूचियो की संख्या दो करके (अधिक संरक्षित स्तर के पशुओं की एक अनुसूची), (2) वर्मिन प्रजातियों की अनुसूची को हटाकर, और (3) संधि के परिशिष्टों में दर्ज नमूनों की एक अनुसूची को संलग्न करके (अनुसूचित नमूने)।
साइट्स संधि के दृष्टि से विधेयक में प्रावधान है कि केंद्र सरकार प्रबंधकीय प्राधिकार नमूनों के व्यापार के लिए निर्यात या आयात परमिट देगी जबकि वैज्ञानिक प्राधिकार उन नमूनों के अस्तित्व पर होने वाले प्रभावों के संबंध में सलाह देगी जिनका व्यापार किया जा रहा है। अनुसूचित नमूनों के व्यापार में संलग्न प्रत्येक व्यक्ति को लेनदेन का विवरण प्रबंधकीय प्राधिकार को देना होगा। साइट्स के अनुसार, प्रबंधकीय प्राधिकार नमूने के लिए एक पहचान चिन्ह इस्तेमाल कर सकती है। विधेयक नमूने पर लगे पहचान चिन्ह में बदलाव करने या उसे हटाने पर प्रतिबंध लगाता है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों के कब्जे में अनुसूचित पशुओं के जीवित नमूने हैं, उन्हें प्रबंधकीय प्राधिकार से पंजीकरण का प्रमाणन हासिल करना होगा।
विधेयक केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह इनवेजÞवि एलियन प्रजातियों के आयात, व्यापार, उन्हें कब्जे में लेने या उनकी वृद्धि को विनियमित कर सकती है। इनवेजÞवि एलियन प्रजातियां ऐसे पौधे या पशुओं की प्रजातियां होती हैं जो भारत की मूल निवासी नहीं हैं और जिनके आने से वन्य जीव या उनके निवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। केंद्र सरकार किसी अधिकारी को यह अधिकार दे सकती है कि वह इन इनवेजÞवि प्रजातियों को जब्त करे और उनका निस्तारण करे।
मौजूदा कानून में अभयारण्यों का नियंत्रण एक चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन को दिया गया है जिसकी नियुक्ति राज्य सरकार करती है। विधेयक में प्रावधान है कि चीफ वॉर्डन के कार्य अभयारण्य की प्रबंधकीय योजना के अनुसार होने चाहिए। इन योजनाओं को केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार तैयार किया जाएगा और ये योजनाएं चीफ वॉर्डन द्वारा मंजूर होंगी। विशेष क्षेत्रों में आने वाले अभयारण्यों के लिए प्रबंधकीय योजना संबंधित ग्राम सभा से सलाह करके तैयार की जानी चाहिए। विशेष क्षेत्रों में ऐसे अनुसूचित क्षेत्र आते हैं जहां अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों को मान्यता) एक्ट, 2006 लागू है। अनुसूचित क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछड़े इलाके आते हैं जहां मुख्यतया जनजाति आबादी रहती है। इन क्षेत्रों को संविधान की पांचवीं अनुसूची में अधिसूचित किया गया है। विधेयक केंद्र सरकार को यह अधिकार भी देता है कि वह किसी संरक्षण रिजर्व को अधिसूचित कर सकती है। विधेयक यह प्रावधान करता है कि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी कैप्टिव पशु या पशु उत्पाद को चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन को सरेंडर कर सकता है। इन वस्तुओं को सरेंडर करने वाले व्यक्ति को कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाएगी। सरेंडर की जाने वाली वस्तुएं राज्य सरकार की संपत्ति बन जाएंगी। विधेयक में कानून का उल्लंघन करने पर कारावास एवं जुर्माने की राशि को बढ़ाने का भी प्रावधान है।

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