राधारमण मन्दिर के मुख्य विगृह के प्राकट्योत्सव पर भक्ति कर रही है नृत्य

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मथुरा : कान्हा नगरी मथुरा में राधारमण मन्दिर के 480वें प्राकट्योत्सव के अवसर पर वृन्दावन का कोना कोना कृष्णमय हो गया है और यहां चहुंओर भक्ति नृत्य कर रही है।राधारमण मन्दिर में विगृह न केवल स्वयं प्राकट्य है बल्कि यहां की परंपराएं आज भी अपने भीतर प्राचीनता को समेटे हुए हैं। मन्दिर की स्थापना से लेकर आज तक पूजन में माचिस का प्रयोग नही किया गया। अरण्य मन्थन से 480 वर्ष पूर्व मन्दिर के रसोईघर में प्रज्वलित की गई अग्नि आज भी प्रज्वलित हो रही है।
मन्दिर के सेवायत आचार्य अनिल गोस्वामी ने बताया कि इस मन्दिर का विगृह महान भक्त गोपाल भट्ट गोस्वामी को नेपाल में गंडकी नदी में स्वयं ठाकुर ने उपलब्ध कराया था। स्रान के दौरान उनकी धोती में आए शालिग्राम को गोस्वामी ने जब ग्रहण नहीं किया तो आकाशवाणी से उन्हें इसे ले जाने का आदेश हुआ था। यह उनकी अनन्य भक्ति का ही प्रभाव है कि शालिग्राम से ठाकुर स्वयं प्रकट हुए जो आज मुख्य विगृह के रूप में पूजित हैं।
उन्होंने बताया कि ठाकुर के विगृह का श्रृंगार करने माहिर होने के कारण गोपाल भट्ट स्वामी गोविन्ददेव, गोपीनाथ और मदनमोहन मन्दिर में भी नित्य ठाकुर का श्रंगार करने जाते थे और राधारमण महराज का भी श्रंगार करते थे। जब वे बहुत अधिक वृद्ध हो गए तो उनके लिए अन्य मन्दिरों मे जाना मुश्किल हो गया। एक शाम उन्होंने ठाकुर से प्रार्थना की कि तीनो विगृह के रूप में वे उन्हें सेवा का अवसर दें। कहते हैं कि सच्चे भक्त को भगवान कभी निराश नही करते और ऐसा ही गोस्वामी के साथ हुआ। जब अगले दिन वे ठाकुर का श्रंगार करने लगे तो उनके अचानक अश्रु धारा बह निकली क्योकि ठाकुर ने उनकी विनती स्वीकार कर ली और उन्होने अपने अन्दर तीनो मन्दिरों के विगृह समेट लिया था।
उनका मुख गोविन्ददेव , वक्षस्थल गोपीनाथ की तरह का एवं चरण मदनमोहन जी श्री राधारमण के विगृह में समाहित हो गए थे।
गोस्वामी ने बताया कि कुछ लोग कहते हैं कि राधारमण जी के दर्शन करने से तीन ठाकुर के दर्शन का सुख मिलता है लेकिन हकीकत यह है कि इस मन्दिर के श्रीविगृह के दर्शन करने से पांच ठाकुर के दर्शन का सुख मिलता है क्योंकि ऐसा भी कहा जाता है कि गौरांग महाप्रभु ही राधारमण के रूप में प्रकट हुए हैं इसलिए इस मन्दिर के विगृह के दर्शन करने पर गोविन्ददेव, गोपीनाथ, मदनमोहन, गौरांग प्रभु एवं स्वयं राधारमण जी महराज के दर्शन होते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि धरती के गोपाल से मिलने बैकुंठ के गोपाल आए।
इस मन्दिर की दूसरी विशेषता शुचितापूर्ण तरीके से मुख्य विगृह का अभिषेक है। विशेष अवसरों पर कई मन दूध , दही, घी, शहद, बूरा, औषधियों और महाऔषधियों से मुख्य विगृह का अभिषेक कई घंटे तक चलता है तथा जो अपने अन्दर उस प्राचीनता को समेटे हुए है जिसके लिए ब्रज मशहूर है।
सेवायत आचार्य ने बताया कि मन्दिर के प्राकट्योत्सव पर एक विशेष कार्यक्रम ब्रह्मलीन संतों के आवाहन का होता है । इस परंपरा को गोपाल भट्ट स्वामी ने स्वयं जब प्रारंभ किया था तो उस समय तक 64 महन्त ब्रह्मलीन हो गए थे। आज इनकी संख्या 290 से अधिक है। इस कार्यक्रम में ब्रह्मलीन संतों की विधिवत प्रसादी पत्तल लगाकर व्यंजन परोसकर उनका आवाहन किया जाता है उन्हें विधिवत दक्षिणा भी दी जाती है।यह कार्यक्रम इस बार 18 मई को शाम को आयोजित किया पूरी शुचिता के साथ किया गया था।
उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में ठाकुर को शीतलता प्रदान करना इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंश है।इसके लिए केले के तने के छिलके और शीतलता प्रदान करनेवाले पुष्पों का प्रयोग कर नित्य नया फूल बंगला बनाया जाता है तथा इसी बंगले में ठाकुर विराजते हैं। बिजली की रोशनी में यह बंगला चांदी से बना प्रतीत होता है। ठाकुर के भोग प्रसाद में शीतलता प्रदान करनेवाले पदार्थेा का अधिकतम उपयोग होता है। शुचिता बनाए रखने के लिए मन्दिर के जगमोहन और गर्भगृह में सेवायत के अलावा अन्य का प्रवेश वर्जित होता है। इस मन्दिर में लगनेवाला भोग सेवायत गोस्वामी स्वयं तैयार करते हैं महिलाओं को ठाकुर का भोग तैयार करने की अनुमति नही है। कुल मिलाकर ठाकुर के प्राकट्योत्सव पर वृन्दावन में भक्ति नृत्य कर रही है।

 

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