भोलेनाथ की कृपा से खुद ही सीखा कांवड़ बनाना, सावन आते ही खिल उठता है सूरज का चेहरा

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बरेली, अमृत विचार। सावन की शुरुआत 14 जुलाई से हो चुकी है। इस मौके पर देशभर के शिवालयों मंदिर में भगवान भोलेनाथ की अराधना के साथ शिवलिंग पर श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। कई जगहों पर कांवड़ यात्रा होती है, जिसमें कांवड़िए कावड़ में जल लेकर भगवान शिव् का जलाभिषेक करते हैं। पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था। विष के प्रभाव को खत्म करने के लिए रावण ने कांवड़ में जल भरकर बागपत स्थित पुरा महादेव में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।

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वहीं, यूपी के बरेली जनपद में मठ की चौकी के पास कांवड़ बनाने वाले सूरज अमृत विचार से ख़ास बातचीत में बताते हैं कि उन्होंने कांवड़ बनाने की शुरुआत साल 2014 से की। सूरज ने बताया कि उसने कांवड़ बनाना किसी से नहीं सीखा। वह भोलेनाथ का भक्त है और एक दिन साल 2013 में उसने भी कांवड़ बनाने की इच्छा जताई। दोस्तों से बात की और लग गया कांवड़ बनाने के काम में। फिर क्या था उसे भोलेनाथ की भक्ति पर भरोसा और खुद पर विश्वास था ऐसे में उसने लोगों को कांवड़ बनाते देखा और काम सीख लिया। इसके बाद अगले ही साल से कांवड़ बनाना शुरू कर दिया। सूरज साल 2014 से ही लगातार कांवड़ बना रहे हैं। सूरज बताते हैं कि उनकी तैयार की हुई कांवड़ हरिद्वार, गोला, कछला समेत कई जगह जाती है और उन्हें बरेली के बाहर से भी कई कांवड़ बनाने के ऑर्डर मिलते हैं।

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हर तरह की बनाते हैं कांवड़
सूरज का कहना है कि वह हर तरह की कांवड़ बनाते हैं, जिसमें सामान्य कांवड़, खड़ी कांवड़, डाक कांवड़, दांडी कांवड़,बैकुंठी कांवड़, शिवलिंग कांवड़, पालकी कांवड़ आदि शामिल हैं। बरेली में कांवड़ 4-5 जगह बनती हैं। कांवड़ का ऑर्डर सावन शुरू होने के 2 महीने पहले से ही आने लगता है और काम भी सावन शुरू होने के दो महीने पहले ही शुरू हो जाता है। एक दिन में 2-3 छोटी कांवड़ बन जाती है। वहीं, बड़ी कांवड़ बनाने 2-3 दिन लगते हैं।

सावन आने से दो महीने पहले से ही बनते हैं कांवड़
सूरज बताते हैं कि वो सावन शुरू होने से दो से ढाई महीने पहले ही कांवड़ के ढांचे तैयार करने में जुट जाते हैं। उनके मुताबिक बांस, सुतली, टूल, पतली डंडी, गोटा, लाल कपड़ा, टोकरी आदि सामान की जरूरत होती है। ऐसे में लागत बढ़ने से कांवड़ की कीमतों में काफी उछाल आ गया है। सूरज ने बताया कि उनके पास सबसे सस्ती कांवड़ 500-600 रुपए और सबसे महँगी कांवड़ 11,000 रुपए तक की है। वहीं, खड़ी और झूलेश्री कांवड़ की कीमतों मे भी दोगुनी वृद्धि हुई है। इसके अलावा छीके वाले कांवड़, टोकरी वाली कांवड़, एक मंजिला कांवड़, दो मंजिला कांवड़ और तीन मंजिला कांवड़ के दामों में भी बढ़ोतरी हुई है।

लॉकडाउन में हुआ नुकसान
सूरज बताते हैं कि जब कोरोनाकाल में लॉकडाउन लगा था तो उन्हें काफी नुकसान भी हुआ, उन्होंने कांवड़ का सामान रख लिया था लेकिन उसे बेच नहीं पाए। अब जब करीब दो साल बाद कांवड़ यात्रा शुरू हुई है तो इसे लेकर सूरज काफी उत्साहित हैं। इस बार महंगाई के बावजूद कांवड़ ठीक-ठाक बिक रही है। लेकिन मन में ये भी शंका था कि इस बार भी अगर कांवड़ यात्रा नहीं हुई तो उन्हें और ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

अप्रतिम सुख मिलता है
सूरज वैसे तो अकेले ही कांवड़ बनाते हैं लेकिन जब ऑर्डर ज्यादा आ जाते हैं तो वह अपने साथ एक-दो कारीगर रख लेते हैं। सूरज करीब 12-14 घंटे प्रतिदिन कांवड़ बनाते हैं। सूरज कहते हैं कि वैसे तो यह कम बारह महीने का नहीं है, वह लाइट वगैरह का काम करता है, लेकिन जब भी सावन आने वाला होता है सूरज के चेहरे की चमक और बढ़ जाती है क्योंकि उसे भोले की भक्ति में कांवड़ बनाने का अप्रतिम सुख व आनंद मिलने लगता है।

कांवड़ पर भी महंगाई की मार
कांवड़ का सामान बेचेने वाले व्यापारियों का कहना है ​कि इस बार सामान 20 से 30 परसेंट तक महंगा आ रहा है। कांवड़ यात्रा के लिए कांवड़िए को झोली, पिट्ठु, डंडे, नाड़ा, डोरी, गंगाजली, गमछे और भोले की टी शर्ट की आवश्यकता होती है। जिनके दाम इस बार 20 से 30 रुपए तक बढ़ गए हैं।

कैसे बनती है कांवड़ ?
कांवड़ बनाने में बांस, फेविकोल, कपड़े, डमरू, फूल-माला, घुंघरू, मंदिर, लोहे का बारीक तार और मजबूत धागे का प्रयोग किया जाता है। हरिद्वार में कई जगह कांवड़ तैयार की जाती है। कांवड़ तैयार होने के बाद उसे फूल-माला, घंटी और घुंघरू से सजाया जाता है। इसके बाद गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है। धूप-दीप जलाकर बम भोले के जयकारों ओर भजनों के साथ कांवड़ यात्री जल भरने आते हैं और भगवान शिव को जला जढ़ाकर प्रसन्‍न होते हैं।

कांवड़ यात्रियों के लिए नियम
कांवड़ यात्रियों के लिए विशेष नियम होते हैं। मसलन, बिना नहाए कांवड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते। तेल, साबुन, कंघी का प्रयोग नहीं करते। यात्रा में शामिल सभी कांवड़ यात्री एक-दूसरे को भोला, भोली कहकर बुलाते हैं। ध्‍यान रखना होता है कि कांवड़ जमीन से न छूए। डाक कांवड़ यात्रा में शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं तक वर्जित होती हैं।

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