भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जुडी कुछ रोचक जानकारी..

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भगवान जगन्नाथ के स्मरण में निकाली जाने वाली जगन्नाथ यात्रा का हिन्दू धर्म में बड़ा ही पावन महत्व है भगवान जगन्नाथ से आशय जगत के नाथ यानी भगवान विष्णु से है उड़ीसा के पूरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों से एक है भगवान जगनाथ की द्वादश यात्राओं ने गुंडिचा यात्रा सबसे जरुरी है। इसी गुंडिचा मंदिर में विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा की दारू प्रतिमाये बनायीं थी। जगरनाथ रथ यात्रा आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्रितीय तिथि को शुरू होती है इस बार ये 1 जुलाई 2022 को है। ढोल,नगाड़े ,तुरही और शंख ध्वनि के बीच भक्तगण इन रथो को खींचते है  आइए आपको जगन्नाथ यात्रा से जुडी कुछ रोचक जानकारी के बारे में बताते है

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पूरी रथयात्रा के लिए बलराम,श्रीकृष्ण और देवी सुभारदा के लिए तीन अलग अलग रथ बनाए गए है। रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ ,उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्री कृष्ण का रथ होता है। इसे उनके कलर और उचाई से पहचाना जाता है। 

 भगवान जगन्नाथ का नंदिघोष रथ 45.6 फिट ऊँचा,बलरामजी जा तलध्बज रथ 45 फिट ऊँचा और श्रदेवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फिट ऊँचा होता है। इन रथो को किसी भी तरह के कील,कांटे या बाकी किसी धातु का इस्तेमाल नहीं होता। रथो के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है। 

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जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा शुरू होकर पूरी जगर से गुजरते हुए रथ गुंडिचा मंदिर जाती है। यहाँ भगवान जगन्नाथ ,बलभद्र और देवी सुभ्रद्रा सात दिनों के लिए विश्राम करते है। गुंडिचा मंदिर भगवान की मौसी का घर है। इस मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है की यही पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ ,बलभद्र और देवी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था।