नाग पंचमी (2 अगस्त) पर विशेष: कौन थे इच्छाधारी नाग-नागिन?

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यह जानते हुए भी कि ये सब काल्पनिक बाते हैं जो हमारे भीतर की रोमांचप्रियता को संतुष्ट करने के लिए लिखी और कही जाती हैं, इच्छाधारी नाग-नागिन की रहस्यमयी कहानियों और फिल्मों के प्रति हर उम्र के लोगों में एक प्रबल आकर्षण रहा है। इन्हें देखा तो किसी ने नहीं है, लेकिन इस विषय पर प्राचीन काल से अबतक कही-सुनी जानेवाली असंख्य कथाओं के माध्यम से इनसे हम सब परिचित हैं। इन कथाओं से जितनी जानकारी हमें हासिल है उसके अनुसार इच्छाधारी नाग सांपों का एक बहुत दुर्लभ रूपांतरण है जो आसानी से नहीं दिखता। जब कोई सांप अपनी उम्र के सौ साल पूरे कर लेता है तो वह इच्छाधारी नाग या नागिन में परिवर्तन हो जाता है।

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चमत्कारी शक्तियों से लैस ये इच्छाधारी नाग-नागिन इच्छानुसार मनुष्य सहित किसी भी प्राणी का रूप धर सकते हैं। वे बहुत लंबी उम्र जीते हैं बशर्ते कोई असमय उनकी हत्या न कर दे। उनके साथ रहस्यमय नागमणि के किस्से भी जुड़े हैं। नागों में पाया जाने वाला एक ऐसा चमकीला और बेशकीमती पत्थर जिसे हासिल करने वाला आरोग्य और दुनिया भर के ऐश्वर्य का स्वामी बन जाता है। नाग-नागिन के अमर प्रेम और नाग की हत्या हो जाने पर नागिन के प्रतिशोध की लोमहर्षक कथाओं से भी हम परिचित हैं। नागिनें सुंदर स्त्री का रूप धरकर मनुष्यों से प्रेम भी करती हैं, अल्पकालिक विवाह भी और उनके साथ बदले की कार्रवाई भी। वास्तविकता और तर्क से परे होने के बावजूद इन इच्छाधारी नाग और नागिनों ने सदियों से हमारे मानस का एक हिस्सा घेर रखा हैं।

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आज के वैज्ञानिक युग में भी इच्छाधारी नाग-नागिनों के प्रति अधिसंख्य लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आई है। लोग उनसे डरते भी हैं और देवता मानकर घरों तथा मंदिरों में उनकी पूजा भी करते हैं। देश भर में किसी न किसी रूप में मनाया जाने वाला नाग पूजा, नागपंचमी या मणिपूजा का पर्व उन्हीं को समर्पित है। माना जाता है कि पूजा से नागों को प्रसन्न करने से परिवार को सर्प-दंश के भय से मुक्ति और आरोग्य का वरदान मिलता है। हिंदुओं के कई देवताओं को नागों का अवतार बताया गया है।

पुराणों के अनुसार, राम के भाई लक्ष्मण और कृष्ण के भाई बलराम शेषनाग के अवतार थे। भगवान विष्णु की शय्या और भगवान शिव की गर्दन नागों के बिना सूनी है। नागों को देवताओं की भक्ति करते भी दिखाया गया है और उनके साथ युद्ध लड़ते भी। जाहिर है कि ये तमाम कथाएं मिथक और कल्पना की उड़ान भर हैं, लेकिन यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि इन सभी कल्पनाओं का जन्म कहां से, कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ।

इच्छाधारी नाग-नागिन की कहानियों का संबंध प्राचीन भारत की एक शक्तिशाली नाग जाति के लोगों से था। सांपों की पूजा करने वाली इस जाति को ज्यादातर किन्नरों और गंधर्वों की तरह अलौकिक माना जाता है, लेकिन कहीं-कहीं उसकी गणना असुरों में भी हुई है। प्राचीन काल में हमारे देश में शूरवीर, प्रतापी नागवंशियों की बड़ी लंबी परंपरा रही है। अथर्ववेद में भी श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नाम के नाग योद्धाओं के उल्लेख आए हैं। महाभारत काल में पूरे भारतवर्ष में इस जाति के कई समूह फैले हुए दिखते हैं। हिमालय से लेकर असम, मणिपुर और नागालैंड तक उनका प्रभुत्व था। कुछ विद्वान मानते हैं कि नाग जाति मूल रूप से हिमालय के उस पार की रहने वाली थी। इसका प्रमाण यह दिया जाता है कि तिब्बत के लोग अपनी भाषा को आज भी नागभाषा कहते हैं।

एक अन्य विचार के अनुसार नाग मूलत: कश्मीर के रहने वाले थे। कभी वहां का एक नगर अनंतनाग नागों का प्रमुख गढ़ हुआ करता था। कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में नाग नाम की एक जाति आज भी मौजूद है। रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र को उनका आवास बताया गया है। नाग महेंद्र और मैनाक पर्वतों की गुफाओं में भी नजर आते हैं। अर्थ यह कि प्राचीन भारत में नाग उत्तर, पूर्व और दक्षिण सभी दिशाओं में फैले हुए थे। संभवतः यही कारण है कि समूचे भारत में असंख्य नगरों और गांवों के नाम आज भी नाग शब्द से शुरू या खत्म होते हैं।

पुराणों में नागों की उत्पत्ति कश्यप ऋषि और उनकी एक पत्नी कद्रू से बताई गई है। उन दोनों के आठ पुत्र हुए जिनके नाम थे शेष या अनंत. वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। उन प्रतापी नागों ने देश के लगभग हर हिस्से में अपने छोटे-बड़े साम्राज्य खड़े किए थे। उन्हें नागों का प्रमुख अष्टकुल कहा जाता है। शेष नाग का साम्राज्य कश्मीर में था। उन्हें नागों का प्रथम राजा माना जाता है। उन्हें पुराणों में विष्णु की शय्या की तरह दिखाया गया है। नाग शैव अर्थात भगवान शिव के भक्त हुआ करते थे। उनमें वासुकी शिव के सर्वाधिक प्रिय थे जिन्हें शिव के गले में लिपटे नाग की तरह दिखाया जाता है।

समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग को ही देवों द्वारा रस्सी या पथप्रदर्शक बनाया गया था। नागराज तक्षक ने एक बड़े साम्राज्य तक्षशिला की स्थापना की थी। कृष्ण द्वारा मारा गया कालिय नाग वस्तुतः कोई सांप नहीं, नाग जाति का एक योद्धा था जिसने यमुना नदी के आसपास के क्षेत्र पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। आर्यों और नागों के बीच प्रेम और विवाह के कई उदाहरण पुराणों में मिलते हैं। भगवान कृष्ण की दादी मारिषा एक नागकन्या थी। अर्जुन का एक विवाह उलूपी नाम की नागकन्या से हुआ था। अर्जुन और उलूपी के पुत्र थे अरावन जिनका दक्षिण भारत में एक मंदिर है। उभयलिंगी किन्नर उन्हें अपना पति मानते हैं। भीम के पुत्र घटोत्कच भी एक नागकन्या अहिलवती से ब्याहे गए थे जिनका पुत्र वीर योद्धा बर्बरीक था।

प्राचीन भारत में सत्ता और प्रभुत्व तथा साम्राज्य के विस्तार के लिए आर्य राजाओं ने नाग राजाओं के साथ कई युद्ध लड़े थे। ज्यादातर युद्धों में नाग ही आर्यों पर भारी पड़े थे। कारण यह था कि नागों को प्रत्यक्ष युद्ध में ही नहीं, परोक्ष या छद्म युद्ध में भी विशेषज्ञता हासिल थी। वेश बदलने की कला में वे माहिर थे। वे छद्मयुद्ध के उद्देश्य से या बदले के किसी अभियान में शत्रुओं के जिस राज्य में जाते थे, वहां के लोगों के रूप धरकर उनपर धोखे से हमले करते थे। वेश बदलने की कला में नाग स्त्रियां भी कम कुशल नहीं थीं। इस जाति की स्त्रियां अपने सौंदर्य के लिए जानी जाती थीं। अपने रूप, अदाओं और छद्म वेशभूषा से वे विपक्षी योद्धाओं को वश में कर उनसे युद्ध और रणनीति के भेद भी हासिल करती थीं और आवश्यकता पड़ने पर उनकी हत्या भी कर देती थीं।

कहा जाता है कि प्राचीन भारत के सत्ता-संघर्ष में विषकन्याओं के प्रयोग की परंपरा का आरंभ नाग राजाओं द्वारा ही किया गया था। इस जाति की कुछ रूपवती स्त्रियों को लंबे समय तक सांपों के विष के छोटे-छोटे खुराक देकर जहरीला बना दिया जाता था। इसके साथ उन्हें नृत्य-गीत, सजने और पुरुषों को लुभाने की कला में भी पारंगत बनाया जाता था। वे धीरे-धीरे इतनी जहरीली हो जातीं थीं कि उनसे शारीरिक संपर्क करने वाले व्यक्ति की तत्काल मौत हो जाती थी।

विषकन्याओं का इस्तेमाल नाग अपने शत्रुओं पर विजय पाने अथवा षड्यंत्र का पता लगाने के उद्देश्य से करते थे। युद्ध में पतियों के मारे जाने के बाद इन्हीं विषकन्याओं के बूते नाग स्त्रियां अपने पतियों के हत्यारों से बदला लेती थीं। जरूरत के मुताबिक वेश बदलने, धोखे से हमले करने और शत्रुओं के विरुद्ध विषकन्याओं के इस्तेमाल की कला में पारंगत होने के कारण नाग जाति के लोगों को इच्छाधारी, विषधारी, चमत्कारी कहा गया। नागमणि के मिथक के पीछे नागों के पास चमकने वाला कोई पत्थर या रत्न हो सकता है जिसके सहारे वे अंधेरे में यात्राएं करते होंगे।

कालांतर में सांपों की पूजा करने वाले नाग लोगों को जनसाधारण द्वारा अज्ञानतावश सांप की तरह ही देखा जाने लगा। नाग स्त्री-पुरुषों के शौर्य, उनके प्रेम, उनके बदले की कथाओं और विषकन्याओं के लोमहर्षक अभियानों की घटनाओं को सांपों के साथ जोड़ दिया गया। कथावाचन की सदियों लंबी मौखिक परंपरा के कारण धीरे-धीरे सांपों के ईर्दगिर्द चमत्कार की असंख्य झूठी-सच्ची कथाएं भी जुड़ती चली गईं। ऐसा संभवतः इसीलिए भी हुआ क्योंकि प्राचीन काल में साहित्य या किस्सागोई के मूल्यांकन और लोकप्रियता की कसौटी उसका यथार्थ नहीं, बल्कि चमत्कारिता हुआ करती थी।

पाठकों और श्रोताओं की रुचि जगाने के लिए वास्तविक घटनाओं को भी चमत्कारिक रूप से प्रस्तुत करने की हमारे देश में परंपरा रही है। हमारे पुराण वस्तुतः इतिहास ही हैं, लेकिन चमत्कारिता के इसी आग्रह के कारण उनमें इतिहास कुछ ऐसा विकृत हुआ है कि उनके बीच से वास्तविक तथ्यों को निकाल लेना आज नीर-क्षीर विवेक जैसा ही एक दुःसाध्य कार्य होकर रह गया है।

-ध्रुव गुप्त

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