नागपंचमी का पर्व और मानवेतर वंश का मिथक

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डॉ. चंद्र विजय चतुर्वेदी
प्रयागराज। श्रावण शुक्ल पंचमी नाग पंचमी के पर्व के रूप में मनाया जाता है। नागपंचमी लोकपर्व की भांति पचैया के नाम से गांवों में मनाया जाता रहा है। गांव के मेले में शारीरिक व्यायाम का प्रदर्शन और प्रतियोगिताएं होती थी। इस त्यौहार के मूल में मानवेतर वंश का मानव वंश में विलय और समन्वित होने का मिथक भी जुड़ा है।

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महाभारत और पुराणों में देव, दानव, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा, यक्ष, नाग, गरुण, वानर, रीछ आदि अनेक मानवेतर वंशों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में बहुत से मानवेतर वंशोंके कश्यप ऋषि की तेरह पत्नियों की संतान होने का उल्लेख मिलता है। महाभारत आदिपर्व में राक्षस, यक्ष, गन्धर्व को पुलह, पुलस्त, अगस्त्य जैसे ऋषियों की संतान कहा गया है।

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जिस प्रकार समस्त मानव जाति के जनक मनु को माना जाता है, उसी प्रकार मानवेतर वंश के जनक सप्त ऋषि हैं। ब्रह्माण्ड पुराण में वानर वंश को पुलह और हरिभद्रा की संतान बताया गया है। कश्यप ऋषि के नागपुत्रों में प्रमुख हैं अनंत, वासुकि, तक्षक। प्रयागराज में वासुकि और तक्षक तीर्थ हैं, ये दोनों प्रयाग के देवताओं में सम्मिलित किये जाते हैं। नाग राजवंश रहे हैं।

एक बार जब ये प्रजा को बहुत कष्ट देने लगे तो ब्रह्मदेव ने इन्हे श्राप दिया कि जन्मजेय के सर्पयज्ञ और गरुड़ द्वारा तुम्हारा नाश होगा। नागों द्वारा अनुनय विनय करने पर श्राप से मुक्ति का रास्ता भी बताया और नागतीर्थ पर रहने का निर्देश दिया।

नाग जाति में आस्तीक नाग प्रसिद्द ऋषि हुए जो भृगुकुल के जरत्कारु ऋषि के संतान थे। आस्तिक ऋषि के सत्प्रयासों ,विद्वता तथा दूरदृष्टि के कारण जन्मजेय को अपना सर्पयज्ञ रोकना पड़ा था जिसे पुराणों में सर्पसत्र भी कहा गया है।

नागऋषि आस्तीक ने ही राजा जन्मजेय से इंद्र तथा तक्षक के प्राणों की रक्षा की याचना की थी। आस्तिक की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर जन्मजेय ने सर्पसत्र बंद कर दिया। नन्दिवर्धनी पंचमी के दिन सर्पयज्ञ बंद हुआ था। अतः नाग राज्यों में इस तिथि को पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

पुराणों में वर्णित कथाओ के आधार पर यह ज्ञात होता है की मानव और मानव से इतर वंशों में आपसी पारिवारिक सम्बन्ध रहे हैं। मानव वंश मनु के द्वारा प्रतिपादित राजधर्म, समाजधर्म तथा व्यक्ति धर्म का अनुपालन निष्ठां और अनुशासन से करते रहे जबकि मानवेतर वंश स्वच्छंदतावादी रहे। मानवीयकरण ही सनातनता है। इस सूत्र का पालन करते हुए मानवेतर संस्कृतियों का विलय मानव संस्कृति में होता रहा। नागपंचमी भी ऐसा ही सांस्कृतिक विलय का पर्व है।

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