नए सिरे से विचार

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विगत दिनों गुरुद्वारे पर हमले ने अफगानिस्तान में भारत की सक्रियता पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी समूह आइएस-खुरासान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। जाहिर है कि तालिबान के खिलाफ विरोध का उदय हो रहा है। तालिबान को इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासान प्रॉविंस (आईएसकेपी) से विरोध का सामना करना पड़ रहा है जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान के अलावा ईरान और भारत के कुछ हिस्सों में ख़िलाफत की स्थापना करना चाहता है।

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यह संगठन आईएसआईएस का अफगान अध्याय भी है और अपनी अलग धमक भी रखता है। उज्बेक, चेचन, उइग़र के अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन भी खोरासन इलाके के आतंकी संगठन से जुड़े हैं। जब तालिबान अमेरीका और अफगान फौज के खिलाफ लड़ रहे थे, तब भी खोरासन गुट का नाम उभरा था, लेकिन उसे ‘हक्कानी ग्रुप’ का एक अदद मोर्चा करार देते हुए मुद्दा दबा दिया गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मॉनीटरिंग टीम की एक रपट में खुलासा किया गया है कि अफगानिस्तान में अल कायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद सरीखे दुर्दान्त आतंकी संगठन भी सक्रिय हैं।

वैश्विक संगठन इसके खिलाफ कोई कार्रवाई आज तक नहीं कर पाए हैं, यह विवशता समझ के परे है। वैसे तो अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी के दस महीने बीत चुके हैं लेकिन ज्यादातर अफगानी नागरिक अभी भी इस संगठन की वैधता को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। जब तालिबान एक छापामार गुट से बदलकर एक वैध सरकार में परिवर्तित हो गया है, उस वक्त विरोधी गुट तालिबान के खिलाफ हमले के जरिए अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे हैं।

अब भारत के लिए अफ़ग़ानिस्तान की अहमियत को देखते हुए यह आवश्यक है कि वह अपनी अफगान नीति पर नए सिरे से विचार करे। विशेषकर इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान के संदिग्ध इरादों को देखते हुए जरूरी है कि भारत अफगानिस्तान को पूरी तरह अनदेखा न करे।

भारत की अफगानिस्तान नीति हमेशा आम अफगानियों की भलाई पर केंद्रित रही है। अफगान लोग जिस प्रकार की मानवीय आपदा से जूझ रहे हैं, उसे देखते हुए भारत की ओर से मदद का दायरा भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। भारत अफगानिस्तान को 20,000 टन गेहूं, 13 टन दवाएं, कपड़े, कोविडरोधी टीकों की पांच लाख खुराक उपलब्ध करा रहा है। इसने अफगानिस्तान में भारत की साख और विश्वसनीयता बढ़ाई है। ऐसे में भारत के अफगानिस्तान में रणनीतिक हित भी सधने चाहिए, तभी उनकी मदद करने की सार्थकता होगी। ऐसे में भारत के लिए अवसर है कि वह आगे तालिबान से संपर्क अपनी शर्तों पर बनाए।