घोषित आपातकाल में निजाम से नजर मिलाने वाला कलाकार

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मुंबई। देश में घोषित आपातकाल के दौरान एक सूचना एवं प्रसारण केंद्रीय मंत्री थे नाम था विद्याचरण शुक्ल, उन्होंने उस वक्त पार्श्वगायक किशोर कुमार के गानों को आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारण पर बैन लगा दिया था और साथ में उनके ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग की बिक्री पर रोक लगा दी थी। वजह थी, किशोर का सरकारी प्रचार प्रसार के लिए अपनी कला के प्रदर्शन से इनकार करना।

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बॉलीवुड के मशहूर सिंगर और एक्टर रहे किशोर कुमार का वास्तविक नाम आभास कुमार गांगुली था। उनका जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में एक बंगाली परिवार में हुआ था। 4 भाई बहनों में से किशोर सबसे छोटे थे। पिता कुंजालाल गांगुली वकालत करते थे। जबकि उनके दोनों बड़े भाई अशोक कुमार और अनूप कुमार बंबई में स्थापित हो चुके थे, जब किशोर काफी छोटे थे।

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किशोर एक गायक ही नहीं अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, संगीतकार और गीतकार भी थे। सबसे ज्यादा 8 फिल्मफेयर अवार्ड उन्होंने जीते थे। बहरहाल हम बात कर रहे थे आपातकाल के दौरान उनके साथ हुई ज्यादती को लेकर।

प्रभात पब्लिकेशन में छपी इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर शीर्षक नामक किताब में लेखक बलबीर दत्त लिखते हैं, किशोर कुमार को युवा कांग्रेस के एक समारोह में अपना गायन प्रस्तुत करने को कहा गया था, लेकिन वे वहाँ नहीं जाना चाहते थे। फिर उनको प्रधानमत्री के 20 सूत्रीय कार्यक्रम के प्रचार प्रसार अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए कहा गया.उन्होंने इससे भी इंकार कर दिया। किशोर के इंकार के बाद अधिकारियों ने दिल्ली लौटकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव बर्नी को बताई। वह आगबबूला हो गए और उन्होंने किशोर कुमार को सबक सीखाने का फैसला किया।

इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की जब सरकार बनी तो उन्होंने एक आयोग गठित किया, जिसका नाम था शाह आयोग। इसका काम था इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों की जाँच करना। 28 अक्टूबर, 1977 को जब इस आयोग के सामने विद्याचरण शुक्ल और बड़े अधिकारियों के पेसी हुई तो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान मंत्रालय द्वारा की गई ज़्यादतियों का दोष खुलकर स्वीकार किया था। इसमें किशोर के गाने व फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगाने का शर्मनाक मामला शामिल था।

लेखक बलबीर दत्त लिखते हैं कि न्यायपूर्ति शाह ने विद्याचरण शुक्ल से पूछा था कि क्या उन्होंने यह महसूस किया एक कलाकार विशेष और समाज के ताने बाने को कितना नुक्सान पहुंचाया है? तब विद्याचरण शुक्ल ने स्वीकार किया था कि यह एक गलत कार्य था, जिसे कुछ अरसे बाद निरस्त कर दिया गया था।

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