गोस्वामी तुलसीदास जी…..!

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गोस्वामी तुलसीदास जी…!

 

“मातु-पिता जग जाय तज्यो , 

विधिहू न लिखी कछु कछु भाल भलाई ।

नीच , निरादर-भाजन , कादर ,

कूकर टूकन लागि ललाई ।।”

 

यह कवितावली का २१४वां पद है जिसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने बाल्यकाल की स्थिति को स्वयं प्रकट किया है । जिसका अर्थ है —

 

माता-पिता ने मुझे जन्म देकर मेरा परित्याग कर दिया और ब्रह्मा ने भी मेरे ललाट पर भाग्य की कोई उत्तम रेखा नहीं बनाई थी । इस कारण मैं नीच और अपमानित होकर कुत्ते की भांति टुकड़ों के लालच में घूमा करता था ।

 

उन्हीं तुलसीदास जी को आज भारतवर्ष में ऐसा कौन होगा जो न जानता होगा ! ऊनकी कालजयी कृति “रामचरितमानस” ने उन्हें उनके जीवनकाल में ही घर-घर में ख्यापित किया और अपार यश और सम्मान का भाजन बनाया । जिसका संकेत भी उन्होंने ही अपने एक पंक्ति में किया है ; जिसमें वे कहते हैं कि राम नाम की महिमा के कारण मेरे जैसा मनुष्य भी महामुनि वाल्मीकि सा प्रतिष्ठा पा रहा है ।—-

 

“राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप 
तुलसी से जग मनियत महामुनि सो ।”

 

साक्षात् धर्म के विग्रहवान् स्वरूप भगवान् श्रीरामचन्द्र जी के अमर यश को गाकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपने यश को अमरत्व प्रदान किया । जिस प्रकार श्रीराम इस भारत भूमि के आत्मा हैं , उसी प्रकार गोस्वामी जी का मानस भी भारतभूमि के प्राण हैं ।

 

आत्मा तो उपाधि-भेद से सर्वदा सर्वत्र व्याप्त है । जन्म-मरण व हानि लाभ से परे है । किन्तु प्राण निकल जाने पर हृष्ट-पुष्ट , हंसता-खेलता शरीर भी जिस प्रकार क्षण भर में लाश बन जाता है । रामचरितमानस को भारत से विलग करके देखने पर बिल्कुल ऐसे ही दृश्य की कल्पना की जा सकती है ।

 

किन्तु , गोस्वामी जी का रामबोला से गोस्वामी तुलसीदास बनने का सफर इतना सरल भी नहीं था । उन्होंने अपनी बाल्यावस्था के दीन-दशा को जिस प्रकार मार्मिक शब्दों में चित्रित किया है । पहले उन पर संक्षेप में सही लेकिन दृष्टिपात करते हैं , फिर आगे लिखेंगे । कवितावली में ही एक स्थान पर उन्होंने लिखा है —-

 

“जायो कुल मगन , बधावनो बजायो सुनि,

भयो परिताप पाप जननी जनक को ।

बारें ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन ,

जानत हो चारि फल चारिही चनक को ।।”

 

अर्थात् ऐसे दरिद्र कुल में मेरा जन्म हुआ कि माता-पिता को उस समय के बधावे को भी सुन कर अपनी विवशता के कारण महान कष्ट का अनुभव होने लगा । मैं अपनी बाल्यावस्था से ही दूसरों के द्वार-द्वार पर दीन बनकर हाथ फैलाता फिरा और उस समय के चार चने के दानों को भी चारों पदार्थ समझता रहा ।

 

इसी प्रकार “विनय-पत्रिका” के एक पद में भी वे कहते हैं —

 

द्वार-द्वार दीनता कही काढि रद , परि पाहूं ।

हैं दयालु दुनि दस दिसा दुखदोष दलन छम कियो न संभाषण काहूं ।।

तनु जन्य कुटिल कीट ज्यों तज्यो मातु-पिताहूं ।

काहे को रोस दोस काहि धौं मेरे ही अभाग ,

मोसों सकुचत छुइ सब छाहूं ।।”

 

अर्थात् मैं अपनी दीनता की चर्चा द्वार-द्वार पर जाकर किया करता था और अपने दांतों को दिखाता हुआ लोगों का चरण स्पर्श करता रहा । संसार में ऐसे दयालुओं की कमी नहीं थी जो मेरी पीड़ा को दूर कर सकते थे , किन्तु किसी ने मुझसे सीधी बात भी नहीं की और वे मेरी छांह छूने में भी संकोच करते रहे । उस समय मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दे कर कुटिल कीट की भांति छोड़ दिया था ।”

 

जब इतिहास को सहेजने का कार्य ऋतम्भरा प्रज्ञा सम्पन्न ऋषियों के हाथ होता है तो हजारों-लाखों वर्ष पुराना इतिहास भी व्यास-वाल्मीकि आदि ऋषियों द्वारा रामायण-महाभारत व पुराणों के रूप में युगों तक यथावत् रहता है । किन्तु हम सामान्य मनुष्य के हाथ में जैसे ही यह कार्य आता है ; केवल चार सौ वर्ष पुराना इतिहास में भी मतभेद प्रकट होने लगता है । जिसका उदहारण गोस्वामी जी के समय को लेकर लोगों की विभिन्न धारणाओं के रूप में है ।

 

वैसे उनके जीवन काल को लेकर भले ही कइयों मतभेद हो , पर उनके मृत्यु सम्वत् १६८० को लेकर लग्भग सभी विद्वान् एकमत है । और उनका देहान्त काशी के असीघाट में हुआ था ; यह भी लग्भग सभी मानते हैं । केवल “घटरामायण” में कहा कि उनका शरीर वरुणा नदी के तीर छूटा था । जो भी हो , यह तो कम से कम माना ही कि उनका शरीर काशी में छूटा था ।

 

गोस्वामी जी के मृत्यु सम्वत् में सब एकमत होकर भी उनके मृत्यु तिथि को लेकर दो मत प्रचलित है ; जिनमें श्रावण शुक्ल सप्तमी तिथि के पक्ष में अधिक लोग हैं ।

 

गीताप्रेस गोरखपुर , वेंकटेश प्रेस आदि के रामायणों में जो गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवनचरित्र दिया गया है , उनमें एक दोहा आता है , जो बहुत प्रचलित है । मैंने उत्तर प्रदेश पाठ्यक्रमों में भी छपे गोस्वामी जी के जीवनचरित्र में देखा —-

 

संवत सोरह सौ असी , असी गंग के तीर ।

श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी तजे शरीर ।।”

 

पर यहां समस्या यह है कि सप्तमी तो ठीक है , किन्तु वार कौन सा था —- इस विषय पर दोहे में नहीं कहा गया । यदि वार का भी संकेत किया जाता तो जांच के लिए गणना करके मिलान करते उस दिन के तिथि व वार का ।

 

दूसरा पक्ष जो है , वह “श्रावण कृष्णा तीज” के पक्ष में है । “मूल गोसाईं चरित” भी गीताप्रेस गोरखपुर से ही छपा है , जिसमें आया है —-

 

संवत सोरह सौ असी , असी गंग के तीर ।

सावन स्यामा तीज सनि , तुलसी तज्यो शरीर।।”

 

गोस्वामी तुलसीदास जी के मित्र टोडर चौधरी के वंशज प्रत्येक वर्ष इसी तिथि को उनकी निधन-तिथि मनाया भी करते हैं ।

 

और फिर यहां पर तिथि के साथ शनिवार भी जुड़ा हुआ है ; जिसे डॉ माताप्रसाद गुप्त ने प्रयाग विश्वविद्यालय में सन् १९४२ को गणना करके शुद्ध सिद्ध किया है । किन्तु रजनीकान्त मिश्र जी ने “मानस-मीमांसा” में , जो किताब-महल इलाहाबाद से प्रकाशित है ; उसमें कहा कि उस दिन तीज नहीं बल्कि चौथी या पंचमी था । फिर भी श्रावण कृष्ण तृतिया संवत् १६८० को गोस्वामी जी की मृत्यु तिथि स्वीकार करना ही पहले पक्ष की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक रहेगा ।

 

इसके बाद गोस्वामीजी के जन्मतिथि को निश्चित करने के लिये भी कोई एक निर्धारित मत नहीं है । “मूल गोसाईं चरित” के लेखक जहां इसे —

 

पन्द्रह सौ चौवन विषै , कालिन्दी के तीर ।

श्रावण सुक्ला सप्तमी , तुलसी धरेउ शरीर ।।”

 

दोहे के द्वारा श्रावण शुक्ला सप्तमी संवत् १५५४ बताते हैं , वहीं डाँ विल्सन उनके संवत् को १६०० तक ले जाना चाहते हैं ।

 

घट रामायण के रचयिता का कहना है कि —

 

संवत् पन्द्रह सै नवासी ।

भादौ सुदी मंगल एकादशी ।।

 

अर्थात् भाद्रपद , शुक्लपक्ष , एकादशी , मंगलवार , संवत् १५८९ ।

 

इस प्रकार से कई प्रकार का मत गोस्वामी जी के जन्म के सम्बन्ध में कहा जाता है ; जो ५० वर्षों के भीतर का ही है । उसपर भी डां विल्सन के मत का तो किसी ने भी समर्थन नहीं किया । ठीक भी है ! उनके मत का कोई निश्चित आधार भी तो नहीं है । श्रावण शुक्ल सप्तमी ही युक्तिसंगत प्रतीत होता है ।

 

गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्मस्थान के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न मत रखें हैं ; जिनमें चार प्रसिद्ध है —- हस्तिनापुर , चित्रकूट के निकट वर्तमान हाजीपुर , तारी तथा राजापुर ।

 

इनमें से तारी तथा राजापुर को लेकर बहुत दिनों तक वाद-विवाद चला था । पर अब तारी का नाम बहुत कम ही सुनने में आता है और उसकी जगह एटा जिले के सोरों ग्राम को राजापुर के विरुद्ध खड़ा किया गया है ।

 

तारी के पक्ष वालों का कहना था कि वहां पर जन्म लेने के बहुत बाद गोस्वामी जी अपनी स्त्री से विरक्त होकर राजापुर आये थे और वहां भी बहुत समय तक रहे । तारी के पक्ष में डाँ. विल्सन जैसे लोग थे , जिनका मत अधिकतर दन्त-कथाओं पर ही अवलम्बित रहता था और जिन्होंने गोस्वामी जी के समय को लेकर भी ऐसा पक्ष रखा , जो अग्राह्य ही नहीं हास्यास्पद भी था ।

 

और फिर तारी में स्पष्ट स्मारकादि का भी अभाव है परन्तु सोरों के पक्ष में समर्थन करने वाले केवल अनुश्रुतियों पर ही निर्भर नहीं रहते , वे कुछ लिखित सामग्री भी प्रस्तुत करते हैं ।

 

राजापुर के पक्ष में कहा जाता है कि उसका समर्थन “घटरामायण” ,में दिए गए राजापुर के विवरण से होता है ।—

 

“राजापुर जमुना के तीरा ।

जहँ तुलसी का भया शरीरा ।।

विधि बुंदेल खंड वोहि देसा ।

चित्रकोटि बीच दस कोसा ।।”

 

ऐसे ही “मूल-गोसाईं-चरित” देखने से लगता है कि उसमें राजापुर को ही ‘राजियपुर’ कहा होगा —

 

“जमुनातट दूवत को पुरवा ।

बसेत सब जातिन को कुरवा ।।

सुकृती सतपात्र सुधोमषिया ।

रजियापुर राजगुरु मषिया ।।”

 

इसके अलावा राजापुर के स्मारक व सनदों से भी इसकी पुष्टि होती हैं ।

 

राजापुर पक्ष वालों का यह भी कहना है कि रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड का “तापस-प्रसंग” भी राजापुर का समर्थन करता है । पर उनका यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि किसी तापस का अमुक स्थान पर प्रकट होना उसे उसकी तपोभूमि सिद्ध करता है । वहां पर उसकी जन्मभूमि भी हो ; यह अनिवार्य नहीं ।

 

उधर सोरों पक्ष के समर्थकों ने अपने मत की पुष्टि में लग्भग एक दर्जन ऐसी हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज की है , जिनसे इस विषय पर न्यूनाधिक प्रकाश पड़ता है और जिनके आधार पर वे लोग न केवल गोस्वामी जी की जन्मभूमि का ही पता देते हैं , अपितु उनकी पत्नी , उनके गुरु आदि से भी परिचित कराते हैं ।

 

इनमें “रत्नावली लघु दोहा संग्रह” १११ दोहों की रचना है , जिसकी रचियत्री रत्नावली गोस्वामी तुलसीदास जी की पत्नी कही जाती है । इस संग्रह के दोहे इस प्रकार है —

 

तीरथ आदि वराह जे , तीरथ सुरसरि धार ।

याही तीरथ आइ पिय , भजहु जगत करतार ।।

प्रभु वराह पदपूत महि , जन्म मही पुनि एहि ।

सुरसरि तट महि त्यागि असि , गये धाम पिय केहि ।।”

 

इसके आधार पर समझा जाता है कि गोस्वामी जी की पत्नी ने उनकी विरक्ति के अनन्तर उन्हें लक्ष्य करके ऐसा कहा था । इससे स्पष्ट होता है कि वह उनकी ‘जन्म मही’ उस स्थान को ही बताती है , जो गङ्गा नदी के तट पर बसा है और जो वाराह तीर्थ जैसे नाम से भी प्रसिद्ध है । उस तीर्थ का एक नाम सूकर क्षेत्र भी है , जिसके विषय में ‘सूकर क्षेत्र महात्म्य’ नाम का एक ग्रन्थ भी उपलब्ध है ।

कुल मिलाकर गोस्वामी जी का जन्म कहीं भी हुआ हो , रहते तो वे सनातन धर्म को मानने वाले अगणित रामभक्तों के हृदय में ही है । रामचरितमानस के दिव्य प्रकाश से पण्डित-मूर्ख, अमीर-गरीब , जात-कुजात सबके घर में उन्होंने जो ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की दिव्य ज्योति जलाई है , कल्पान्त पर्यन्त भी भारत का हिन्दू समाज उनका आभारी और ऋणी रहेगा ।