Tuesday, June 28, 2022
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क्षेत्रीय पार्टियां परिवार से बाहर नहीं जातीं

अपवाद के लिए भी ध्यान नहीं आ रहा है कि किसी क्षेत्रीय पार्टी में टूट हुई हो और पार्टी संस्थापक नेता के परिवार के हाथ से निकल कर दूसरे व्यक्ति के हाथ में चली गई हो। क्षेत्रीय पार्टियां भी टूटी हैं लेकिन उनकी टूट कभी बहुत बड़ी नहीं होती है। दूसरे, टूटने के बाद ज्यादातर मामलों में पार्टी परिवार के अंदर ही रही है और तीसरे, क्षेत्रीय पार्टियों से अलग होकर बनी कोई दूसरी क्षेत्रीय पार्टी ज्यादा सफल नहीं हुई है। इसलिए बिना ठाकरे के शिव सेना की कल्पना नहीं की जा सकती है। हो सकता है कि शिव सेना टूट जाए और एकनाथ शिंदे के साथ ज्यादा संख्या में विधायक, सांसद चले जाएं लेकिन उसके बावजूद शिव सेना ठाकरे परिवार की ही रहेगी। ध्यान रहे राज ठाकरे ने भी शिव सेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई थी लेकिन पार्टी सफल नहीं हुई, जबकि वे ठाकरे परिवार के सदस्य थे।

कांग्रेस और भाजपा से अलग होकर कई पार्टियां बनीं, जिनमें से कुछ सफल भी रहीं। इसी तरह समाजवादी खेमे में टूट-फूट के बाद कई पार्टियां बनीं और सफल रहीं। लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ ऐसा नहीं है। किसी मजबूत क्षत्रप की बनाई पार्टियां टूटती नहीं हैं और टूटती भी हैं तो अलग होना समूह खत्म हो जाता है। मिसाल के तौर पर नब्बे के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा में बड़ी टूट हुई थी। कृष्णा मार्डी ने अलग गुट बना लिया था लेकिन उसके अगले ही चुनाव में पार्टी समाप्त हो गई। अकाली दल से अलग होकर प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल ने पंजाब पीपुल्स पार्टी बनाई थी लेकिन पहले ही चुनाव में पार्टी समाप्त हो गई। डीएमके से अलग होकर एमके अलागिरी ने अलग पार्टी बनाई लेकिन चल नहीं सके। समाजवादी पार्टी से अलग होकर शिवपाल यादव ने पार्टी बनाई, लेकिन असफल रहे।

टूटने के बाद जो पार्टियां परिवार के ही किसी व्यक्ति के हाथ में रह गई उनमें से कुछ पार्टियां सफल हो गईं। जैसे हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल से अलग होकर दुष्यंत चौटाला ने जननायक जनता पार्टी बनाई और पहले ही चुनाव में सफल हुए। अब चौटाला परिवार की मुख्य  पार्टी जेजेपी ही है। एनटी रामाराव की बनाई तेलुगू देशम पार्टी को उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बगावत करके अपने नियंत्रण में ले लिया था और वे सफल भी रहे। लेकिन बाहर का कोई व्यक्ति ऐसी पार्टियों को नहीं हथिया सकता है, जिन पर किसी एक परिवार का नियंत्रण हो।

ऐसी पार्टियां कमजोर होने के बावजूद भी नेता के करिश्मे से बंधी होती हैं। जैसे एकदम हाशिए पर पहंचने के बावजूद बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, तमिलनाडु में डीएमके, कर्नाटक में जेडीएस, उत्तर प्रदेश में आरएलडी, पंजाब में अकाली दल जैसी अनेक पार्टियां हैं, जिनमें कोई बड़ी टूट नहीं हुई और पार्टियां सर्वाइव कर गईं। इसमें बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी की एक अलग मिसाल है, जिसमें परिवार के सदस्यों में झगड़ा हुआ, पार्टी टूटी और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह जब्त हो गया। इसके बावजूद यह तय है कि रामविलास पासवान की विरासत उनके बेटे चिराग पासवान के साथ ही रहेगी।

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