आपसी फूट और सत्ता के नशे में चूर है,आत्ममुग्ध काँग्रेसी…


आम जन का कहना है कि अगर अभी चुनाव हुए तो बमुश्किल 2 विधानसभा में ही जीत दर्ज करा पाएगी कांग्रेस

रायगढ़:- राज्य को सबसे ज्यादा राजश्व देना वाले जिलों में शुमार औद्योगिक जिला रायगढ़ की परिस्थितियों में बीते साढ़े तीन सालों में कोई खास परिवर्तन देंखने को नही मिला है।। जबकि बीते विधान सभा चुनाव में जिले की पांचों विधान सभाओं से कांग्रेस के प्रत्याशियों को स्थानीय लोगों ने इस उम्मीद से जिताया था,कि नए विधायक जिले के लिए कुछ बेहतर काम करेंगे।

परन्तु यथार्थ में ऐसा हुआ नही, रायगढ विधायक के अलावा किसी ने भी अपने क्षेत्र की समश्याओं को
लेकर अब तक के सम्पन्न विधान सभा सत्रों में अपनी पार्टी के सरकार से अब तक कोई सवाल जवाब नही किया।

यही वजह है कि रायगढ़ जिले का विकास कार्य कछुआ गति से चलता रहा। जिले की ज्यादातर सड़कें जो पिछले डेढ़ दशकों से खस्ताहाल बनी हुई थी। वो आज भी करीब-करीब वैसी ही नजर आती हैं। इनमें किसी वाहन से सफर करना तो क्या पैदल चलना तक दूभर हो चुका है।

यही वजह है कि जिले और शहर की बदहाल सड़कों में साल भर में ऐसा कोई दिन नही जाता जब जिले की सड़क किसी न किसी राहगीर के खून से लाल नही होती है। वर्ष 2018 के पूर्व जिले की खराब सड़के काँग्रेसी नेताओं के लिए बड़े चुनावी मुद्दे थे।

परन्तु सत्ता में आने के साढ़े तीन साल बाद भी सड़के तो जैसी की वैसी ही रही। हां कुछ एक जगहों में इन सड़कों के काम के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे काँग्रेसी नेताओं ने जरूर कर लिए।

आप दूसरे शब्दों में कह सकते है कि आज रायगढ़ प्रदेश का ऐसा जिला है जहां आधे से अधिक सड़कें तो सिर्फ कागजों में ही बनी है। सच कहा जाए तो सड़क तो बस एक झरोखा है,औद्योगिक जिले में विकास का एक भी कोई ऐसा काम नही किया गया है जिसे सत्तारूढ़ पार्टी के नेता जिले के लोगों को खुल कर बता सके,कि यह काम हमारा या हमारी सरकार के द्वारा किया गया है।

जिले के अलावा शहर के विकास कार्यों के लिए डीएमएफ और सीएसआर फंड की पृथक व्यवस्था है आज इस फंड का भी भगवान ही मालिक है। शहर में यदा कदा होने वाले छोटे मोटे या गैर जरूरी विकास कार्यों में खुला भ्रष्टाचार देखा जा सकता है,जिसकी कहीं कोई सुनवाई नही होती है। जिले से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के काम को साढ़े तीन साल की स्थानीय लोग चुपचाप देख रहे हैं,सम्भवतः यही से वर्तमान काँग्रेसी जन-प्रतिनिधियों का भविष्य भी तय होना है। ज्यादातर आम लोगों की यह राय है कि जितनी अंधेरगर्दी इन साढ़े तीन सालों में मची है,शायद रायगढ़ जिले ने अपने इतिहास में कभी नही देखा है।

जिला और नगरीय प्रशासन में भ्रष्टाचार इस हद तक हावी हो चुका है कि जिले में अब सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के खिलाफ माहौल बनने लगा है। हां ये अलग बात है कि सत्ताधारी पार्टी के नेता और पदाधिकारी या तो इसे भांप नहीं रही हैं या अपनी आत्ममुग्धता से ही संतुष्ट हैं।

कई धड़ों में बंटी जिला कांग्रेस की अपनी ढफली और अपना राग है। संगठन और पार्टी की मजबूती के प्रति इनकी नैतिक जिम्मेदारी लगभग खत्म हो चुकी है। जिसका एक नमूना प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव के दो दिवसीय जिला दौरा में देखने को मिला। यहां पांचों विधायको ने या तो अपनी उपस्थिति दर्ज नही कराई या खानापूर्ति के नाम पर सिर्फ चंद मिनट अपना चेहरा दिखा कर चलते बने। पार्टी कार्यालय के बाहर की घटना और निगम का वाक्या शहर की आम जनता ने अपनी आंखों से देखा है। ऊपर से पार्टी कार्यालय के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं की गुटबाजी दुर्व्यवहार से कौन वाकिफ नही है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि उसके कार्यकर्ता और पदाधिकारी अपने ही पार्टी के वजूद पर बट्टा लगा रहे हैं। कुल मिलाकर सूबे के मुखिया भूपेश बघेल के सपनों को आग लगाने में जिले के नेताओं ने कोई कोर कसर नही छोड़ी है।

स्थानीय लोग जिला कांग्रेस पार्टी की कार्यशैली से पूरी तरह से निराश हैं। इसके बाद भी कांग्रेसी सत्ता के नशे में इतने चूर है कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है कि आमजन की उनके या पार्टी के प्रति क्या राय बन रही है। उन्हें यह भी नही पता है कि सत्ताधारी पार्टी के लिए उसके जनप्रतिनिधियों के अलावा पार्टी के सभी छोटे-बड़े पदाधिकारियों की भी समाज और शहर के प्रति कोई नैतिक जिम्मेदारी होती है। सिर्फ निर्वाचित जन-प्रतिनिधि अकेले अपने बूते सारे काम नही कर सकता है। जिनमें अपनी सरकार की नीतियों और कार्ययोजनाओं को आम जन तक पहुंचाना सबसे बड़ा काम होता है। जनप्रतिनिधि लोगों की समश्याओ के निराकरण के काम करता है। तो पार्टी कार्यकर्ता मौजूदा सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करता है।लेकिन हालात ऐसे है कि निगम से लेकर पंचायत स्तर तक पार्टी का काम करने वाले सत्ताधारी नेता खुद ये नही बता सकते कि राज्य सरकार की कौन सी योजना से किसे फायदा मिला या मिलना है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि कई धड़ों में बंटे पार्टी के कार्यकर्ता सिर्फ बचे समय में सत्ता की आड़ में जितना स्वहित साध सकें उतना साधने में लगे है। ऐसे में वो खुद भी ये कह नही सकते कि पार्टी का निर्वाचित नेता दोबारा जीत के साथ वापसी कर सकेगा या नही ।

विदित हो कि कुछ महीने पहले कांग्रेस पार्टी ने राज्य में अपने विधायकों के प्रदर्शन को आंकने के लिए आंतरिक सर्वे किया था जिसमें विधायकों के प्रदर्शन,क्षेत्र में सक्रियता, कार्यकर्ताओं से मुलाकात, सत्ता और संगठन से तालमेल आदि बिंदु शामिल थे। 70 में से 34 विधायकों का प्रदर्शन इतना कमजोर निकला था,कि उनके विरुद्ध दूसरी पार्टी का अदना सा नेता भी चुनाव लड़ ले तो उसकी जीत की संभावना वर्तमान प्रतिनिधि से ज्यादा दिखाई दे रही है। 15 साल से काबिज बीजेपी के एंटी इनकमबेंसी का फायदा कांग्रेस को हुआ था। परन्तु महज कांग्रेस साढ़े तीन साल की कार्यशैली बता रही है कि बड़ी जल्दी कांग्रेस पार्टी उसी राह पर चल पड़ी है। जिस रास्ते पर तत्कालीन सत्ताधारी और आज की विपक्षी पार्टी लगभग 12 से 13 सालों बाद चली थी।।

जिला अध्यक्षों की भी अपनी ढपली अपना राग…

कहने को तो जिला कांग्रेस में दो अनुभवी अध्यक्ष है,पहला शहरी और दूसरा ग्रामीण अध्यक्ष है। ग्रामीण अध्यक्ष ने सारंगढ़ जिला घोषणा के बाद से अपनी राजनीति को वहीं तक सीमित कर लिया है। जिले के अन्य ग्रामीण इलाकों में राज्य सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार से उन्हें कोई वास्ता नही हैं। शहर वाले अध्यक्ष जी ठेका,ट्रांसपॉर्ट और कोयले के कारोबार में पहले से ही मस्त हैं। आप छोटे-मोटे आंदोलनों में सक्रियता के अलावा संगठन या पार्टी के लिए कोई काम करते नही दिखे हैं।

वही नवनिर्मित खास वाला समूह भी पार्टी के लिए भस्मासुर से कम नही है। इनके लिए पार्टी और उसके सिद्धांत व्यक्तिगत स्वार्थ से ज्यादा मायने नही रखते है। पार्टी सत्ता में वापस आई तो पार्टी के साथ अन्यथा दल-बदल कर उसके साथ हो लेने में दो सेकेंड से भी ज्यादा का समय नही लेते हैं। बाकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता आत्ममुग्धता में इतने डूबे हैं कि गर्त में जा रही पार्टी और संगठन का हाल उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है। सेवा दल से लेकर पार्टी के घोषित जनप्रितिनिधि जमीन माफिया हो लिए हैं।

रही लैलूंगा वाले नेताजी की बात वो तो छद्म विकास की रसधारा में इतने डूबे हैं कि वनांचल को क्रांकीट का जंगल बनाने में व प्रशासनिक अधिकारियों को खुश रखने में ही मस्त है। महाजन और सज्जन की कृपा पाने तमनार में शहर के बड़े नेता अंधाधुंध जमीन खरीद रहे हैं। धरमजगढ़ के लाल भी कालरी के खेल से ही लाल हो चुके हैं। उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं। राज्य सरकार की तमाम लाभकारी योजनाओं से वंचित जिले का सबसे पिछड़े विधानसभा कहलाने में भी महोदय को कोई फर्क नही पड़ता है। कमोबेश राज्य के सबसे पिछड़े मंत्री जी का भी यही हाल है उन्हें तो कुछ लोग अपने चश्में से ही विकास दिखा रहे हैं और वो विधानसभा खरसिया के गांव-खेड़े में ही घूम-घूम कर खुश हैं। सम्भवतः चुनाव में मिली पिछली चुनौती को वो भूल चुके हैं,और भावी जीत के लिए पूर्णतः आश्वस्त हैं। जबकि प्रतिद्वंद्वी नेता जमीन से जुड़कर अपने जन सम्पर्क को इस हद तक सफल बना चुके है कि दुबारा अगर उसी क्षेत्र से चुनाव लड़ दें तो आदरणीय को भी दिन में तारे नजर आ जायेंगे।

कुछ इस तरह ही जिला मुख्यालय का आम नागरिक खस्ताहाल सड़को और बजबजाती नालियों के साथ पीने का गटर वाला सप्लाई पानी पा कर दुखी है। उसकी समश्याओं से शहर कर काँग्रेसी जनप्रतिनिधियों को भी कुछ खास लेना-देना नही है। हो सकता है ग्रामीण नागरिक आपके जन सपर्क से खुश हों परन्तु दूसरी तरफ शहरी जन अपना माथा पिट रहा है। क्योंकि उसे शहर की सरकार में भी पार्टी के सबसे ज्यादा जनप्रितिनिधि बिठा कर भी उसे दैनिक मुश्किलों से निजात नही मिला है।सच कहें तो वो खुद को अनाथ मनाने लगा है।

सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं ने सभी जगह अपनी ऐसी पैंठ बनाई है,उनका काम कहीं नही रुकता परन्तु आम नागिरक का काम उनसे नही होता। सारँगढिया नेता जी भी सत्ता की ख़ुशगवारी का आनंद ले रहे है। जिले की तरह सारँगढ़ क्षेत्र या नगर की खस्ता हाल सड़कों की बात आती है तो स्थानीय काँग्रेसी नेताओं को जैसे सांप सूंघ जाता है। सारँगढ़ नगर और क्षेत्र की एक भी सड़क ठीक नहीं और इसे बनाने के लिए सारंगढ़ के जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकारी अफसरों की भी कोई रुचि नही है। यदा-कदा कहीं सड़क का काम चल भी रहा है तो उसे कौन बना रहा है? कैसा बना रहा है? किस स्तर का काम चल रहा है,और सड़क बनाने की गति कैसी है?? इसे देखने सुनने और टोकने वाला कोई काँग्रेसी नेता अभी तक सामने नही आया है। हाँ लेकिन 2018 के पूर्व क्षेत्र की खस्ताहाल सड़कें बड़ा चुनावी मुद्दा जरूर हुआ करती थी।

कुछ इसी तरह जिले के पांचों विधायकों और नगरीय निकाय के नेताओं को भी सड़को की हालत में कोई रूचि नहीं दिखती है। निर्वाचन के शुरुवाती दौर को छोड़ दे तो शायद ही किसी नेता ने सड़क बनाने को लेकर अपनी आवाज बुलंद की हो जबकि इन्हीं सड़कों से लोगों को सरोकार है।

जिले में कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि खराब सड़को के कारण होने वाले हादसों के कारण किसी के भी घर का चिराग असमय बुझ जाए। जबकि यह सिलसिला प्रति दिन बना हुआ है। हां ये बात अलग है कि खराब सड़क या सड़क हादसों के क्रम को लेकर जिले का कोई भी विधायक अब तक गंभीर नजर नहीं आया है। ऐसे में बड़ी संभावना यही है कि खराब सड़के ही आगामी विधान सभा में वापस सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेंगी।

सड़को के अलावा अगर बात की जाए मूलभूत सुविधाओं की तो जिले भर में स्थानीय विधायकों के अलावा वहां कि नगरीय या ग्राम सरकार ने भी जैसी अपेक्षा थी,उसके अनुरूप कतई काम नही किया है। सिर्फ जिला मुख्यालय में कई तरफ ध्यान दें तो यहाँ शासन की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक अमृत मिशन बहुत बुरे दौर के साथ गुजर रहा है,पूरी की पूरी योजना भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। लोग पैसे देकर भी बूंद-बूंद कचरा पानी उपयोग करने को मजबूर हैं। साढ़े तीन सालों में शहर का ड्रेनेज सिस्टम नही सुधारा गया। घण्टे भर की बारिश में शहर की नालियों से बजबजाती गंदगी सड़कों पर आ निकलती है। शहर की सड़क पर चलकर ऐसा लगता है कि आप बड़े से गटर में पैदल या वाहन सहित तैर रहे हों। जबकि शहर सरकार हर साल ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त रखने के नाम लाखों रु खर्च करने दावा करती हैं।

खैर छोड़िए राज्य में 15 साल पुराने सत्ता परिवर्तन के बाद आज पुनः हालात ऐसे बने हुए जैसे परिवर्तन के पहले थे। मतलब परिवर्तन का यह सिलसिला अगले डेढ़ सालों बाद भी बना रहेगा। बस उसकी उम्र करीब 10 साल छोटी हो जाएगी। इस तरह अगर सिर्फ रायगढ़ जिले की बात करें तो यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि स्वहित साधने में एक बानगी से लगे आत्ममुग्ध जिला कांग्रेसियों के हाथ से आगामी विधान सभा चुनाव में पांच विधान सभा सीटों में से तीन विधान सभा की सीट सरकने जा रही है। अब यह सत्ताधरियों को समझना है कि जिले की कौन सी सीट किस वजह से किस तरह विपक्षी पार्टी के हांथ लगने जा रही है।

आम जन का कहना है कि अगर अभी चुनाव हुए तो बमुश्किल 2 विधानसभा में ही जीत दर्ज करा पाएगी कांग्रेस

रायगढ़:- राज्य को सबसे ज्यादा राजश्व देना वाले जिलों में शुमार औद्योगिक जिला रायगढ़ की परिस्थितियों में बीते साढ़े तीन सालों में कोई खास परिवर्तन देंखने को नही मिला है।। जबकि बीते विधान सभा चुनाव में जिले की पांचों विधान सभाओं से कांग्रेस के प्रत्याशियों को स्थानीय लोगों ने इस उम्मीद से जिताया था,कि नए विधायक जिले के लिए कुछ बेहतर काम करेंगे।

परन्तु यथार्थ में ऐसा हुआ नही, रायगढ विधायक के अलावा किसी ने भी अपने क्षेत्र की समश्याओं को
लेकर अब तक के सम्पन्न विधान सभा सत्रों में अपनी पार्टी के सरकार से अब तक कोई सवाल जवाब नही किया।

यही वजह है कि रायगढ़ जिले का विकास कार्य कछुआ गति से चलता रहा। जिले की ज्यादातर सड़कें जो पिछले डेढ़ दशकों से खस्ताहाल बनी हुई थी। वो आज भी करीब-करीब वैसी ही नजर आती हैं। इनमें किसी वाहन से सफर करना तो क्या पैदल चलना तक दूभर हो चुका है।

यही वजह है कि जिले और शहर की बदहाल सड़कों में साल भर में ऐसा कोई दिन नही जाता जब जिले की सड़क किसी न किसी राहगीर के खून से लाल नही होती है। वर्ष 2018 के पूर्व जिले की खराब सड़के काँग्रेसी नेताओं के लिए बड़े चुनावी मुद्दे थे।

परन्तु सत्ता में आने के साढ़े तीन साल बाद भी सड़के तो जैसी की वैसी ही रही। हां कुछ एक जगहों में इन सड़कों के काम के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे काँग्रेसी नेताओं ने जरूर कर लिए।

आप दूसरे शब्दों में कह सकते है कि आज रायगढ़ प्रदेश का ऐसा जिला है जहां आधे से अधिक सड़कें तो सिर्फ कागजों में ही बनी है। सच कहा जाए तो सड़क तो बस एक झरोखा है,औद्योगिक जिले में विकास का एक भी कोई ऐसा काम नही किया गया है जिसे सत्तारूढ़ पार्टी के नेता जिले के लोगों को खुल कर बता सके,कि यह काम हमारा या हमारी सरकार के द्वारा किया गया है।

जिले के अलावा शहर के विकास कार्यों के लिए डीएमएफ और सीएसआर फंड की पृथक व्यवस्था है आज इस फंड का भी भगवान ही मालिक है। शहर में यदा कदा होने वाले छोटे मोटे या गैर जरूरी विकास कार्यों में खुला भ्रष्टाचार देखा जा सकता है,जिसकी कहीं कोई सुनवाई नही होती है। जिले से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के काम को साढ़े तीन साल की स्थानीय लोग चुपचाप देख रहे हैं,सम्भवतः यही से वर्तमान काँग्रेसी जन-प्रतिनिधियों का भविष्य भी तय होना है। ज्यादातर आम लोगों की यह राय है कि जितनी अंधेरगर्दी इन साढ़े तीन सालों में मची है,शायद रायगढ़ जिले ने अपने इतिहास में कभी नही देखा है।

जिला और नगरीय प्रशासन में भ्रष्टाचार इस हद तक हावी हो चुका है कि जिले में अब सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के खिलाफ माहौल बनने लगा है। हां ये अलग बात है कि सत्ताधारी पार्टी के नेता और पदाधिकारी या तो इसे भांप नहीं रही हैं या अपनी आत्ममुग्धता से ही संतुष्ट हैं।

कई धड़ों में बंटी जिला कांग्रेस की अपनी ढफली और अपना राग है। संगठन और पार्टी की मजबूती के प्रति इनकी नैतिक जिम्मेदारी लगभग खत्म हो चुकी है। जिसका एक नमूना प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव के दो दिवसीय जिला दौरा में देखने को मिला। यहां पांचों विधायको ने या तो अपनी उपस्थिति दर्ज नही कराई या खानापूर्ति के नाम पर सिर्फ चंद मिनट अपना चेहरा दिखा कर चलते बने। पार्टी कार्यालय के बाहर की घटना और निगम का वाक्या शहर की आम जनता ने अपनी आंखों से देखा है। ऊपर से पार्टी कार्यालय के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं की गुटबाजी दुर्व्यवहार से कौन वाकिफ नही है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि उसके कार्यकर्ता और पदाधिकारी अपने ही पार्टी के वजूद पर बट्टा लगा रहे हैं। कुल मिलाकर सूबे के मुखिया भूपेश बघेल के सपनों को आग लगाने में जिले के नेताओं ने कोई कोर कसर नही छोड़ी है।

स्थानीय लोग जिला कांग्रेस पार्टी की कार्यशैली से पूरी तरह से निराश हैं। इसके बाद भी कांग्रेसी सत्ता के नशे में इतने चूर है कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है कि आमजन की उनके या पार्टी के प्रति क्या राय बन रही है। उन्हें यह भी नही पता है कि सत्ताधारी पार्टी के लिए उसके जनप्रतिनिधियों के अलावा पार्टी के सभी छोटे-बड़े पदाधिकारियों की भी समाज और शहर के प्रति कोई नैतिक जिम्मेदारी होती है। सिर्फ निर्वाचित जन-प्रतिनिधि अकेले अपने बूते सारे काम नही कर सकता है। जिनमें अपनी सरकार की नीतियों और कार्ययोजनाओं को आम जन तक पहुंचाना सबसे बड़ा काम होता है। जनप्रतिनिधि लोगों की समश्याओ के निराकरण के काम करता है। तो पार्टी कार्यकर्ता मौजूदा सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करता है।लेकिन हालात ऐसे है कि निगम से लेकर पंचायत स्तर तक पार्टी का काम करने वाले सत्ताधारी नेता खुद ये नही बता सकते कि राज्य सरकार की कौन सी योजना से किसे फायदा मिला या मिलना है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि कई धड़ों में बंटे पार्टी के कार्यकर्ता सिर्फ बचे समय में सत्ता की आड़ में जितना स्वहित साध सकें उतना साधने में लगे है। ऐसे में वो खुद भी ये कह नही सकते कि पार्टी का निर्वाचित नेता दोबारा जीत के साथ वापसी कर सकेगा या नही ।

विदित हो कि कुछ महीने पहले कांग्रेस पार्टी ने राज्य में अपने विधायकों के प्रदर्शन को आंकने के लिए आंतरिक सर्वे किया था जिसमें विधायकों के प्रदर्शन,क्षेत्र में सक्रियता, कार्यकर्ताओं से मुलाकात, सत्ता और संगठन से तालमेल आदि बिंदु शामिल थे। 70 में से 34 विधायकों का प्रदर्शन इतना कमजोर निकला था,कि उनके विरुद्ध दूसरी पार्टी का अदना सा नेता भी चुनाव लड़ ले तो उसकी जीत की संभावना वर्तमान प्रतिनिधि से ज्यादा दिखाई दे रही है। 15 साल से काबिज बीजेपी के एंटी इनकमबेंसी का फायदा कांग्रेस को हुआ था। परन्तु महज कांग्रेस साढ़े तीन साल की कार्यशैली बता रही है कि बड़ी जल्दी कांग्रेस पार्टी उसी राह पर चल पड़ी है। जिस रास्ते पर तत्कालीन सत्ताधारी और आज की विपक्षी पार्टी लगभग 12 से 13 सालों बाद चली थी।।

जिला अध्यक्षों की भी अपनी ढपली अपना राग…

कहने को तो जिला कांग्रेस में दो अनुभवी अध्यक्ष है,पहला शहरी और दूसरा ग्रामीण अध्यक्ष है। ग्रामीण अध्यक्ष ने सारंगढ़ जिला घोषणा के बाद से अपनी राजनीति को वहीं तक सीमित कर लिया है। जिले के अन्य ग्रामीण इलाकों में राज्य सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार से उन्हें कोई वास्ता नही हैं। शहर वाले अध्यक्ष जी ठेका,ट्रांसपॉर्ट और कोयले के कारोबार में पहले से ही मस्त हैं। आप छोटे-मोटे आंदोलनों में सक्रियता के अलावा संगठन या पार्टी के लिए कोई काम करते नही दिखे हैं।

वही नवनिर्मित खास वाला समूह भी पार्टी के लिए भस्मासुर से कम नही है। इनके लिए पार्टी और उसके सिद्धांत व्यक्तिगत स्वार्थ से ज्यादा मायने नही रखते है। पार्टी सत्ता में वापस आई तो पार्टी के साथ अन्यथा दल-बदल कर उसके साथ हो लेने में दो सेकेंड से भी ज्यादा का समय नही लेते हैं। बाकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता आत्ममुग्धता में इतने डूबे हैं कि गर्त में जा रही पार्टी और संगठन का हाल उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है। सेवा दल से लेकर पार्टी के घोषित जनप्रितिनिधि जमीन माफिया हो लिए हैं।

रही लैलूंगा वाले नेताजी की बात वो तो छद्म विकास की रसधारा में इतने डूबे हैं कि वनांचल को क्रांकीट का जंगल बनाने में व प्रशासनिक अधिकारियों को खुश रखने में ही मस्त है। महाजन और सज्जन की कृपा पाने तमनार में शहर के बड़े नेता अंधाधुंध जमीन खरीद रहे हैं। धरमजगढ़ के लाल भी कालरी के खेल से ही लाल हो चुके हैं। उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं। राज्य सरकार की तमाम लाभकारी योजनाओं से वंचित जिले का सबसे पिछड़े विधानसभा कहलाने में भी महोदय को कोई फर्क नही पड़ता है। कमोबेश राज्य के सबसे पिछड़े मंत्री जी का भी यही हाल है उन्हें तो कुछ लोग अपने चश्में से ही विकास दिखा रहे हैं और वो विधानसभा खरसिया के गांव-खेड़े में ही घूम-घूम कर खुश हैं। सम्भवतः चुनाव में मिली पिछली चुनौती को वो भूल चुके हैं,और भावी जीत के लिए पूर्णतः आश्वस्त हैं। जबकि प्रतिद्वंद्वी नेता जमीन से जुड़कर अपने जन सम्पर्क को इस हद तक सफल बना चुके है कि दुबारा अगर उसी क्षेत्र से चुनाव लड़ दें तो आदरणीय को भी दिन में तारे नजर आ जायेंगे।

कुछ इस तरह ही जिला मुख्यालय का आम नागरिक खस्ताहाल सड़को और बजबजाती नालियों के साथ पीने का गटर वाला सप्लाई पानी पा कर दुखी है। उसकी समश्याओं से शहर कर काँग्रेसी जनप्रतिनिधियों को भी कुछ खास लेना-देना नही है। हो सकता है ग्रामीण नागरिक आपके जन सपर्क से खुश हों परन्तु दूसरी तरफ शहरी जन अपना माथा पिट रहा है। क्योंकि उसे शहर की सरकार में भी पार्टी के सबसे ज्यादा जनप्रितिनिधि बिठा कर भी उसे दैनिक मुश्किलों से निजात नही मिला है।सच कहें तो वो खुद को अनाथ मनाने लगा है।

सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं ने सभी जगह अपनी ऐसी पैंठ बनाई है,उनका काम कहीं नही रुकता परन्तु आम नागिरक का काम उनसे नही होता। सारँगढिया नेता जी भी सत्ता की ख़ुशगवारी का आनंद ले रहे है। जिले की तरह सारँगढ़ क्षेत्र या नगर की खस्ता हाल सड़कों की बात आती है तो स्थानीय काँग्रेसी नेताओं को जैसे सांप सूंघ जाता है। सारँगढ़ नगर और क्षेत्र की एक भी सड़क ठीक नहीं और इसे बनाने के लिए सारंगढ़ के जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकारी अफसरों की भी कोई रुचि नही है। यदा-कदा कहीं सड़क का काम चल भी रहा है तो उसे कौन बना रहा है? कैसा बना रहा है? किस स्तर का काम चल रहा है,और सड़क बनाने की गति कैसी है?? इसे देखने सुनने और टोकने वाला कोई काँग्रेसी नेता अभी तक सामने नही आया है। हाँ लेकिन 2018 के पूर्व क्षेत्र की खस्ताहाल सड़कें बड़ा चुनावी मुद्दा जरूर हुआ करती थी।

कुछ इसी तरह जिले के पांचों विधायकों और नगरीय निकाय के नेताओं को भी सड़को की हालत में कोई रूचि नहीं दिखती है। निर्वाचन के शुरुवाती दौर को छोड़ दे तो शायद ही किसी नेता ने सड़क बनाने को लेकर अपनी आवाज बुलंद की हो जबकि इन्हीं सड़कों से लोगों को सरोकार है।

जिले में कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि खराब सड़को के कारण होने वाले हादसों के कारण किसी के भी घर का चिराग असमय बुझ जाए। जबकि यह सिलसिला प्रति दिन बना हुआ है। हां ये बात अलग है कि खराब सड़क या सड़क हादसों के क्रम को लेकर जिले का कोई भी विधायक अब तक गंभीर नजर नहीं आया है। ऐसे में बड़ी संभावना यही है कि खराब सड़के ही आगामी विधान सभा में वापस सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेंगी।

सड़को के अलावा अगर बात की जाए मूलभूत सुविधाओं की तो जिले भर में स्थानीय विधायकों के अलावा वहां कि नगरीय या ग्राम सरकार ने भी जैसी अपेक्षा थी,उसके अनुरूप कतई काम नही किया है। सिर्फ जिला मुख्यालय में कई तरफ ध्यान दें तो यहाँ शासन की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक अमृत मिशन बहुत बुरे दौर के साथ गुजर रहा है,पूरी की पूरी योजना भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। लोग पैसे देकर भी बूंद-बूंद कचरा पानी उपयोग करने को मजबूर हैं। साढ़े तीन सालों में शहर का ड्रेनेज सिस्टम नही सुधारा गया। घण्टे भर की बारिश में शहर की नालियों से बजबजाती गंदगी सड़कों पर आ निकलती है। शहर की सड़क पर चलकर ऐसा लगता है कि आप बड़े से गटर में पैदल या वाहन सहित तैर रहे हों। जबकि शहर सरकार हर साल ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त रखने के नाम लाखों रु खर्च करने दावा करती हैं।

खैर छोड़िए राज्य में 15 साल पुराने सत्ता परिवर्तन के बाद आज पुनः हालात ऐसे बने हुए जैसे परिवर्तन के पहले थे। मतलब परिवर्तन का यह सिलसिला अगले डेढ़ सालों बाद भी बना रहेगा। बस उसकी उम्र करीब 10 साल छोटी हो जाएगी। इस तरह अगर सिर्फ रायगढ़ जिले की बात करें तो यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि स्वहित साधने में एक बानगी से लगे आत्ममुग्ध जिला कांग्रेसियों के हाथ से आगामी विधान सभा चुनाव में पांच विधान सभा सीटों में से तीन विधान सभा की सीट सरकने जा रही है। अब यह सत्ताधरियों को समझना है कि जिले की कौन सी सीट किस वजह से किस तरह विपक्षी पार्टी के हांथ लगने जा रही है।